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Showing posts from May, 2013

इनकी दुनिया : है आस-पास, पर पूरी अलग

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क, ख, ग. जैसे शब्दों से आज तक नहीं हुआ सामना बचपन की दहलीज पर पहुंचते ही पेट चलाने के लिए विवश विकास गुप्ता कोलकाता बिडन स्ट्रीट का बेथुन कॉलेजिएट स्कूल. मौका माध्यमिक परीक्षा के रिजल्ट की घोषणा का. स्कूल परिसर में छात्राओं का जमघट. अचानक रिजल्ट की घोषणा हुई. नंबर जानने की उत्सुकता में सारे नोटिस बोर्ड के पास एकत्रित हुए. धीरे-धीरे माहौल उत्साह से भर गया. पास होने वाली छात्राएं खुशी से झूम उठी. इसी बीच अचानक स्कूल के गेट पर नजर गयी. छात्राओं की हरकतों को हैरतअंगेज निगाहों से कुछ मासूम बो लगातार देख रहे थे. उम्र में वे करीब छह-सात वर्ष के होंगे. वे स्कूल में रोज से अलग इस जश्न भरे माहौल को हैरान होकर देख रहे थे. इसी बीच स्कूल के दरवान की डांट खाकर इधर-उधर भाग जाते. दो मिनट के बाद गेट पर फिर से आकर खडे. हो जाते. सवालों से भरी मासूमों की निगाहें मानो पूछ रही हो : क्या हो रहा है अंदर? किसी पार्टी की तैयारी तो नहीं हो रही ? सभी छात्राएं किस बात पर इतना उत्साहित है ? उनके सवालों का जवाब देने वाला कोई नहीं. इसी बीच एक बो ने स्कूल से बाहर निकल रही महिला से डरते हुए पूछ दिया : अंट...

बीवी की नहीं, अपने सोच की मरम्मत करें

राहुल मिश्र, कोलकाता बीवी की मरम्मत करना कुछ मर्दो के लिए गर्व की बात होती है. तभी तो इसका एलान वे अपने दोस्तों में सीना ठोक कर करते हैं, मानो शादी के समय उन्हें समय-समय पर बीवी की मरम्मत करने की खास जिम्मेदारी दी गयी हो. मेरे एक परिचित सुबह-सुबह आये और कहने लगे, चली गयी वो, चारों बच्चों को लेकर मायके. मैंने भी कह दिया, जा रही हो तो हमेशा के लिए जाओ. लौट के मत आना. मैंने पूछा, अचानक ऐसा क्या हुआ, जो भाभी चली गयीं? उन्होंने कहा- मत पूछो, नाक में दम कर रखा था. जब से उसकी मां और भाइयों को घर आने से मना कर दिया, तब से दुश्मन जैसा बरताव कर रही थी. बच्चों को मेरे खिलाफ सिखाती-पढ़ाती है. कल मेरी बहन आयी थी, तो उसके साथ बदतमीजी करने लगी. बताओ, कोई मर्द यह बरदाश्त कर सकता है. इसी पर उसकी जम कर मरम्मत कर दी. तो रो-रो कर पूरा मोहल्ला जमा कर लिया. अपनी मां को फोन लगा दिया. उस बुढ़िया ने उसे चले आने को कहा. सारे फसाद की जड़ वही बुढ़िया है. कभी उसकी भी मरम्मत करूंगा, तब होश ठिकाने आयेगा. मैंने समझाया- देखिए, ऐसे मारपीट मत किया कीजिए. छोटे-छोटे बच्चे हैं, उनके दिमाग पर बुर...

तेरा परिवार-मेरा परिवार का झगड़ा

भारतीय सामाजिक व्यवस्था के अनुसार विवाह को एक बेहद धार्मिक संस्था का दर्जा दिया जाता है और साथ ही इस बंधन में बंधने वाले महिला-पुरुष को पारिवारिक और सामाजिक दोनों ही तौर पर ताउम्र साथ रहने की अनुमति प्रदान की जाती है और साथ ही वह तन-मन से एक-दूसरे के प्रति समर्पित हो जाते हैं. विवाहित संबंध की एक और सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह संबंध ना सिर्फ महिला-पुरुष को एक साथ जोड़कर रखता है बल्कि उन दोनों के परिवारों को भी एक ऐसे नाजुक बंधन में बांध देता है जो उन्हें हर हाल में निभाना पड़ता है. हालांकि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि परिवार वालों का संरक्षण दांपत्य जीवन को और अधिक मजबूत बनाने में सहायक होता है लेकिन आज जब बदलती जीवनशैली और प्राथमिकताओं के बीच दांपत्य जीवन में तनाव का आगमन होने लगा है तो हम इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते कि कहीं ना कहीं विवाहित दंपत्तियों के बीच इस बढ़ते फासले का कारण परिवारवाले भी हैं. विवाह के बाद महिला अपने परिवार को छोड़कर अपने पति के परिवारवालों को स्वीकार कर लेती है वहीं पुरुष की भी जिम्मेदारी अपने और पत्नी दोनों के ही परिवारवालों के लिए बन जाती है. दो लोगों...

पोर्न पर रोक

हाल ही में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट पर अश्लील साइटों की भारी बढ़ोत्तरी पर चिंता जाहिर करते हुए एक नोटिस जारी कर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया. एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए अल्तमस कबीर की अध्यक्षता  वाली पीठ ने माना कि इंटरनेट के लिये कोई विशेष कानून नहीं होने के कारण इस पर मनमाने ढंग से कई ऐसी चीजें डाल दी जाती हैं जो समाज के लिये सही नहीं हैं, खासकर अश्लील साइटें यहां बेधड़क बनाई और देखी जाती हैं. इंटरनेट की बढ़ती उपयोगिता से बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं और ऐसी साइटें उन्हें समय से पहले परिपक्व व हिंसक बना रही हैं. अतः सूचना और प्रौद्योगिकी, सूचना एवं प्रसारण, गृह मंत्रालय तथा संबंधित अन्य संबंधित सरकारी कार्यालयों को निर्देश देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से इस पर जरूरी दिशानिर्देश जारी करने को कहा है. भारत में इंटरनेट के उपयोग की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश महत्वपूर्ण माना जा रहा है और उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही इस पर कोई कानून बनेगा. इंटरनेट के खुले उपयोग पर पाबंदियों का मामला कोई नया नहीं है. कई देशों ने इस पर चिंता जताई है और इस दिशा मे कदम भी...

एक के गुनाह को समुदाय या क्षेत्र से जोड़ना उचित नहीं

अपराध की कई शाखाएं हैं जिन्हें हम मुख्यतः दो श्रेणियों, अप्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अपराध में बांट सकते हैं. हत्या, लूटपाट, चोरी, डकैती, बलात्कार आदि मामले जहां हमेशा से आपराधिक श्रेणियों में गिने जाते रहे हैं वे प्रत्यक्ष एवं घरेलू हिंसा, भ्रूण हत्या, मानसिक प्रताड़ना आदि जो हमारे संविधान में सामाजिक हित व न्याय के उद्येश्य से बाद में आपराधिक श्रेणी में शामिल किये गये, अप्रत्यक्ष अपराधों में गिने जा सकते हैं. इन अपराधों के लिये सजा और अपराध के पैमाने पूरे भारत में समान हैं. ऐसा नहीं कह सकते कि अगर देश की राजधानी दिल्ली में कोई हत्या या बलात्कार का मामला होता है तो यह अधिक आपराधिक है और अगर छोटे से राज्य हिमाचल प्रदेश में होता है तो यह कम महत्वपूर्ण है. सच तो यह है अपराध और अपराधियों का किसी समाज, क्षेत्र या राष्ट्र से कोई नाता नहीं होता, वह तो स्वभाव से ही हिंसक है, आपराधिक है. अपवाद को छोड़ दिया जाये तो लगभग सभी आपराधिक मामलों में अपराधी महज थोड़े से स्वार्थ के लिये कथित अपराध को अंजाम देता है. ऐसे में किसी के निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिये हम उसके क्षेत्र को जिम्मेदार कैसे मान सकते ह...

महिलाओं के विरुद्ध बढ़ती हिंसा

महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा और क्रूरतापूर्ण रवैया गहन चिंता ही नहीं, बल्कि गहराई से चिंतन का विषय है. आखिर क्यूँ दिन-ब-दिन रेप और मर्डर जैसी घटनाएँ बढती जा रही हैं? 16 दिसंबर की घटना पर देशव्यापी हो-हल्ला के बावजूद 5 साल की बच्ची के साथ बलात्कार और अन्य क्रूरतम शारीरिक चोट देने की घटना और इस जैसी अन्य घटनायें इस सदी की त्रासदी कही जायें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. महिलाओं के विरुद्ध बढ़ती हिंसा महिलाओं के विरुद्ध बढ़ती हिंसा की रोकथाम के लिये उठाये गए कदम कोई असर दिखाते नहीं नजर आ रहे हैं. हालात और बदतर ही होते जा रहे हैं. खासकर बलात्कार की बढ़ती घटनायें सोचनीय हैं. हम इसके खिलाफ कड़े-से-कड़ा कानून लाने की हिमायत कर रहे हैं. इसके दोषियों को फाँसी की सजा के प्रावधान के लिये कैंपेन कर रहे हैं पर क्या सचमुच ये कानून इस समस्या के संपूर्ण या आंशिक निदान में भी सहायक होगा? अभी तक के हालातों को देखते हुए तो ऐसा होता नहीं दीख पड़ा और निकट भविष्य में भी ऐसी कोई संभावना नजर नहीं आती. एक और बात जो यहां उल्लेख करना महत्वपूर्ण है वह यह कि 5 वर्ष पहले के आंकड़ा लें तो हम पाते हैं कि उस वक्त महिलाओं क...

अल्पसंख्यकों के लिए

मशहूर साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का यह व्यंग्य करीब दो दशक पहले एक अखबार में प्रकाशित हुआ था अल्पसंख्यक दो प्रकार के होते हैं:  एक वे जो बहुसंख्यक हैं पर अपने को अल्पसंख्यक कहकर ,  उम्दा रोजगार और उम्दा तालीम के सिवा ,  अपनी सनक और समझ के अनुसार सरकार से कोई भी मांग कर सकते हैं , दूसरे वे जो इतने अल्पसंख्यक हैं कि अपनी पहचान बनाए रखने के लिए वे सरकार को बराबर कुछ देते रहते हैं ,  उससे कुछ खींच नहीं पाते. उदाहरण के लिए , दूसरी कोटि के अल्पसंख्यक उत्तर प्रदेश के रोमन कैथोलिक हैं ,  उनकी संख्या सिर्फ हजारों में है , लाखों में नहीं. वे प्राय: विपन्न पर खामोश ,  परिश्रमी और आत्मसम्मानी लोग हैं. उत्तर प्रदेश की सबसे उम्दा शिक्षा संस्थाएं उन्होंने स्थापित की हैं ,  उन्हें वही चला रहे हैं. पहली कोटि के अल्पसंख्यक हमारे बहुसंख्यक मुसलमान भाई हैं. अपनी पहचान या अस्मिता कायम रखने की चिंता अगर किसी को है तो इन्हीं को ,  उत्तर प्रदेश के कैथोलिक ईसाइयों ,  महाराष्ट्र के पारसियों या गुजरात के यहूदियों को नहीं. मुसलमान दंगे-फसाद से घबराए रहते हैं जो कि सचमुच ह...

‘अफसोस है कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर होते जा रहे हैं’

प्रख्यात शिया धर्म गुरु मौलाना डॉ. कल्बे सादिक को उनके उदारवादी नज़रिए के लिए जाना जाता है. आधुनिक शिक्षा और साम्प्रदायिक सौहार्द की पुरजोर वकालत करने वाले कल्बे सादिक धर्म में नयी चीजों के समावेश को ज़रूरी मानते हैं. हिमांशु बाजपेयी की उनसे बातचीत. क्या इस्लाम की छवि एक कट्टरपंथी धर्म की बनती जा रही है जिसमें आधुनिकता और सुधारों के लिए कोई जगह नहीं ? मै सबसे पहले इस बातचीत के माध्यम से सभी लोगों से ये कह देना चाहता हूं कि क़पया वे इस्लाम को मुसलमानों के कामों से और उनकी बातों से न समझें. बहुत अफसोस की बात है कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर होते जा रहे हैं. मै इस्लाम के बारे में जो भी बात करूंगा वो कुरआन और हदीस के आधार पर करूंगा. इस्लाम समाज में सुधार के लिए ही आया था, फिर ये कैसे हो सकता है कि उसमें सुधार की गुंजाइश न हो. सुधार तो हमेशा जारी रहता है और रहना चाहिए. समय आगे बढ़ता है और इसके अनुसार रीफार्म भी होता रहता है. इस्लाम में सुधार के लिए ही शरीयत में इज्तेहाद की प्रक्रिया मौजूद है. इज्तेहाद के माने ही हैं री एप्लीकेशन ऑफ शरिया. शरीयत के बारे में भी लोगों में बहुत सी ग़लतफहमियां ह...

आज की पांच जरूरी चीजें जिन पर गैरइस्लामी होने का ठप्पा है

बेहतर तो यही होता  कि कुछ चीज़ें इस्लामी या गैर इस्लामी होने की अंतहीन बहस में न खींची जातीं. ऐसी बहस में तब तक कोई बुराई नहीं जब तक कि इसका निष्कर्ष ज़रूरी चीजों को गैरइस्लामी न बताता हो. वे चीजें जो किसी प्रगतिशील समाज के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं. लेकिन जब एक बड़ी तादाद अंधे तरीके से इन चीजों पर गैरइस्लामी होने की मुहर लगा रही हो तो इसकी पड़ताल बहुत जरूरी हो जाती है. इसलिए भी कि ये ठप्पा मुसलमानों के विकास के आड़े आकर खड़ा हो सकता है. साथ ही इस्लाम के विषय में भी एक बंधी-बंधाई और गफलत भरी सोच बनाने का जोखिम भी पैदा हो जाता है.  राहत देने वाली बात यह है कि इस्लाम के मूलभूत सिद्धांतों का अध्ययन करने और मुस्लिम विद्वानों से बात करने पर जल्द ही पता चल जाता है कि ज्यादातर जरूरी चीजें जिनको गैरइस्लामी मान लिया गया है, इस्लाम में उनकी कोई मनाही नहीं है. सिर्फ अज्ञान और कुछ लोगों के निहित स्वार्थ के चलते इन्हे इस्लाम के खिलाफ प्रचारित किया जाता है. 1परिवार नियोजन- सामान्यत: परिवार नियोजन को गैरइस्लामी माना जाता है. इसी वजह से कई मुसलमान परिवार नियोजन से सख्त गुरेज करते हैं. इस...

तो हमें तुम्हारी जरूरत ही क्या है मौलाना?

कश्मीर की तीन  मुसलमान लड़कियों को खामोश करके खुश तो बहुत होगे तुम! तुम दुनिया को यह बताना चाहते हो कि उनके गिटार को चुप करवा कर तुमने इस्लाम को बचा लिया भारत में, कश्मीर में. लेकिन असलियत तुम जानते हो, और दूसरे भी कि तुमने इस्लाम को नहीं बल्कि अपनी सत्ता को बचाया है. अगर आम मुसलमान अपनी जिंदगी के फैसले खुद करने लगेगा, खुद सोचने-समझने लगेगा तो फिर तुम किस मर्ज की दवा रह जाओगे? आखिर उन लड़कियों को कहना पड़ा कि 'मुफ्ती ही बेहतर जानते हैं कि अल्लाह का हुक्म क्या है, इसलिए हम मुफ्ती की बात मानते हुए अपना म्यूजिक बंद करते हैं.' वैसे अल्लाह ने ईरान, तुर्की, पाकिस्तान, बांग्लादेश और ट्यूनीशिया के मौलानाओं को म्यूजिक पर पाबंदी क्यूं नहीं बताई? सिर्फ भारतीय मौलाना से अल्लाह यह राजदारी क्यूं करता है? अपनी बेटियों से इतना डरे हुए क्यूं हो, मौलाना? देखें मौलाना, ऐसा है कि आपका औरतों से दुश्मनी वाला रवैया अब किसी तरह परदे में रहने वाला नहीं. अब मुसलमान औरत को समझ में आ रहा है कि पहले तो आपने मजहब को, उसकी जानकारियों को, उसकी राहतों को अगवा कर अपने अंधेरे पिंजरों में कैद कर लिया जहां सिर्फ आ...

वे अवधारणाएं जिन्हें इस्लामी मानना सही नहीं है

निंदक या आलोचक को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति मनुष्य का स्वभाव रहा है कि वह अपनी सामाजिक, राजनीतिक या धार्मिक अस्मिता की रक्षा के प्रति हमेशा सजग रहता है. कभी-कभी रक्षा की यह भावना संयम की मर्यादा को लांघ देती है. 80 के दशक में ईसा के जीवन पर बनी फिल्म द लास्ट टेंपटेशन ऑफ क्राइस्ट (ईसा मसीह की अंतिम लालसाएं) को लेकर इटली में ईसाई लोगों ने भारी प्रदर्शन किए. इनमें हिंसा भी हुई. इसी दौरान सलमान रश्दी की इस्लाम पर एक किताब आई 'शैतानी आयतें'. जिस पर इतना बवाल मचा कि ईरान के धार्मिक नेता आयतुल्लाह खुमैनी ने रश्दी के खिलाफ मौत का फतवा दे दिया. ऐसा ही एक और प्रसंग इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद साहब के कार्टून बनाने का है. सही है कि इस्लाम के अनुयायियों को ऐसी हरकतें आहत करती हैं. लेकिन इन पर कोई हिंसात्मक प्रतिक्रिया देने से पहले क्या यह सही नहीं होगा कि कुरान और इस्लाम के पैगंबर की नसीहतों पर थोड़ा ध्यान दिया जाए. हजरत मोहम्मद के जीवनकाल में गैरमुस्लिम लोग उन पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करते थे और उपहास उड़ाते हुए उन्हें 'अब्तर' पुकारते थे. अरबी भाषा में अब्तर का मोटे तौर पर अर्थ होत...

इस्लामी धर्मग्रंथों की वे अवधारणाएं जिनकी सबसे ज्यादा गलत व्याख्या की गई

किसी भी विचार  की व्याख्या देश-काल और परिस्थिति के तहत भिन्न-भिन्न तरीकों से की जा सकती है. धर्म से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या तो शायद अनगिनत तरीकों से मनुष्य ने अपने आरंभिक काल से ही की है. इस्लामी धर्मग्रंथों में कुछ ऐसी अवधारणाएं हैं जिनकी गलत व्याख्याओं ने इस्लाम के मूल स्वरूप को विकृत किया है. गैरमुसलमानों ने यह काम अपने निहित स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए किया तो कुछ मुसलमानों ने अपने गलत कामों को सही ठहराने के लिए इनका सहारा लिया. परिणामस्वरूप इस्लाम को एक हिंसक और कट्टर धर्म के रूप में जाना जाने लगा. इन गलत व्याख्याओं पर विचार करने से पहले इस्लाम शब्द की उत्पत्ति पर एक नजर डालते हैं. इस्लाम शब्द अरबी भाषा के ‘स’ ‘ल’ ‘म’ धातु से बना है और जिसका अकेला और सीधा अर्थ है शांति. ‘स’ ‘ल’ ‘म’ धातु से जिन अन्य शब्दों का निर्माण हुआ है वे हैं इस्लाम, मुस्लिम, सलाम और इसी तरह के और कई शब्द. इस्लाम वह धर्म, वह पद्धति है जो शांति सिखाए, जो तस्लीम (समर्पित) होना सिखाए. शांति के धर्म को मानने वाला यानी मुसलमान. मुसलमान जब भी आपसे मिलेगा तो कहेगा सलामुनअलैकुम यानी ईश्वर आपको शांति प्रदान...

क्या इस्लाम में बदलाव और सुधारों के लिए कोई गुंजाइश है?

कश्मीरी लड़कियों के बैंड के खिलाफ फतवा, विश्वरूपम फिल्म पर हुआ विवाद और अकबरुद्दीन ओवैसी का भड़काऊ भाषण इन हालिया घटनाओं ने कई लोगों के मन में यह सवाल पैदा कर दिया है ----------------------------------------------------------------------- आरिफ मोहम्मद खान , वरिष्ठ राजनेता और इस्लामी मामलों के जानकार ----------------------------------------------------------------------- इस्लाम में सुधारों और बदलाव से जुड़े सवाल का जवाब दो हिस्सों में दिया जाना चाहिए. एक हिस्सा इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों से जुड़े बदलावों से संबंधित होगा और दूसरा अन्य बदलावों से. जहां तक धर्म के उन सिद्धांतों का सवाल है जो कुरान के मुताबिक बुनियादी या शाश्वत हैं और सभी धार्मिक परंपराओं में एक समान हैं उनमें बदलाव की न तो कोई आवश्यकता है और न ही ऐसा करना वांछनीय है. कुरान कहता है, 'अल्लाह ने तुम्हारे लिए वही दीन (धर्म) मुकर्रर किया है जिसका उसने नूह (पैगंबर) को हुक्म दिया था और जिसकी वाही (आकाशवाणी) हमने तुम्हारी तरफ की है, और जिसका हुक्म हमने इब्राहिम (पैगंबर), मूसा (पैगंबर और यहूदी धर्म के प्रवर्तक) और ईसा (पैगंब...