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Showing posts from May, 2014

सरोवर में भी कमल ही खिले हैं

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राहुल मिश्र, कोलकाता मौसम के साथ मिजाज का बदलना स्वाभाविक है. चुनावी मौसम में चुनाव की बात न हो, त्योहार के मौसम में त्योहार की और खेल के मौसम में खेल की न हो तो ऐसा अप्राकृतिक ही कहलायेगा. ये तो मौसम का ही जादू है कि इन दिनों रवींद्र सरोवर में भी कमल के फूल ही पूरे रौब से खिले हुए हैं. देश का राजनीतिक मौसम भी कमल फूल के खिलने का ही है. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव में कल्पना के परे प्रदर्शन किया. वर्षो बाद किसी एक पार्टी को बहुमत मिला. ऐसे में जहां चार लोग जुटे, वहां यह चर्चा का विषय न रहे तो यह भी बड़ी चर्चा का विषय बन सकता है. दरअसल, सरोवर में कमल फूल के खिलने को राजनीतिक माहौल से जोड़ने का तुक बने न बने, लेकिन रवींद्र सरोवर के पास के पार्को में प्राकृतिक सुख लेने आनेवालों को देश के वर्तमान माहौल पर चर्चा करते पाया जाना आम बात है. यहां चर्चा करनेवालों में कई मोदी तो कुछ दीदी के समर्थक भी होते हैं. नयी सरकार बन रही है, तो सरकार या प्रधानमंत्री क्या करेंगे. किस मुद्दे को कैसे निबटायेंगे. यह मुख्य विषय रहता ही है. पिछले दिनों मार्निग वाकर्स का एक समूह ...

एक आइकोनिक फोटो के पीछे की मार्मिक कहानी ~~~!!

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आसिफ़ अली हाशमी   इथोपिया में एक कुपोषित बच्ची के मरने के इंतज़ार में उसके पास बैठा एक गिद्ध.....!! इस फोटो को सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर न जाने कितनी बार लाखों ..करोड़ों लोगों द्वारा  शेयर किया गया है, करोड़ों लोगों ने इसको टेग किया है...मगर क्या इसके पीछे की मार्मिक कहानी किसी को पता है....? इस फोटो को खींचने वाले फोटोग्राफर ने तीन माह बाद पश्चाताप  में आत्म हत्या कर ली थी...! यह फोटो मार्च 1993 में मशहूर फोटोग्राफर केविन कार्टर ने भुखमरी और कुपोषण से झूझते देश इथोपिया के एक गांव आयोद में खींचा था... यह एक इथोपियाई कुपोषित बच्ची का फोटो है...जो कि अपने माता पिता की झोंपड़ी की और रेंग कर जाने का प्रयत्न कर रही है....माता पिता..खाना ढूँढने जंगल गए हुए हैं....भूख ने उस बच्ची को बेदम कर रखा है...उसकी ताक में एक गिद्ध बैठा है...जो कि उसके मरने का इंतज़ार कर रहा है...केविन कार्टर ने काफी देर इस दृश्य को देखा ...और अपने कैमरे में क़ैद कर लिया.. ..और उस गिद्ध को वहां से उड़ा दिया ! वैसे इस फोटो के अलावा इथोपिया के इस संकट के उन्होंने और भी कई फोटो खींचे थे...मगर यह फोटो उनको विशेष लग...

मरने से पहले बच्‍चे ने कहा भगवान को सब कुछ बताऊंगा

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दमिश्‍क। 'मैं मरने के बाद भगवान को सब कुछ बताऊंगा,' यह शब्‍द उस साल के बच्‍चे के हैं जिसकी सीरिया में हुए ब्‍लास्‍ट में मौत हो चुकी है। ब्‍लास्‍ट में बुरी तरह से घायल इस बच्‍चे को जब एक अस्‍पताल में इलाज के लिए लाया गया तो यह उसके आखिरी शब्‍द थे। इन शब्‍दों के बाद ही इस बच्‍चे ने दम तोड़ दिया। इस बच्‍चे की फोटोग्राफ और उसके  शब्‍द सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं। सवाल उठाए जा रहे हैं कि खुद को इंसान समझने वाले लोगों में क्‍या इंसानियत खत्‍म हो चुकी है। सीरिया में मार्च 2011 से सिविल वॉर जारी है। इस सिविल वॉर में अब तक आधिकारिक‍ तौर पर 150,000 लोगों की मौत हो चुकी है और इसमें से 11,420 बच्‍चे हैं। इस बच्‍चे की फोटो से ही सीरिया में जारी हालातों की एक झलक मिल जाती है। आगे की कुछ स्‍लाइड्स में देखिए इसी बच्‍चे की कुछ तस्‍वीरें जो यकीनन आपकी आंखों में आंसू ला देंगी। रोज बढ़ रहा है आंकड़ा सीरिया में एक अप्रैल तक 150,000 लोगों की मौत रजिस्‍टर हो चुकी हैं। इन 150,000 लोगों की मौतों में फरवरी से लेकर एक अप्रैल के बीच 10,000 लोगों की मौत दर्ज हुई। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक सीरिया में...

मां की लाश से मांग रहा था रुपये

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-गुटखा के लिए मां को मार डाला -मर चुकी मां को बेहोश समझ कर रुपये देने का कर रहा था जिद -तालाब में डूबो कर मां को मारने की कर चुका था कोशिश विकास गुप्ता, कोलकाता ----------------------------- ऐ मां, ला ना रुपये. सिर्फ दस रुपये तो मांग रहा हूं. दे ना, दे दे ना. उठ नाटक मत कर, जल्दी से दे रुपये : जमीन पर अचेत पड़ी वृद्ध मां को वह कुछ इसी तरह हिला-हिला कर रुपये मांग रहा था. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि मां मर चुकी है. उसने कुछ ही देर पहले मां को जोर से दीवार में दे मारा था, क्योंकि वह नशे के लिए रुपये देने से मना कर रही थी. दीवार में टकराने के बाद एक चीख के साथ मां जमीन पर गिर पड़ी थी. उसके सिर से खून बह रहे थे. पर बेटे को दम तोड़ रही मां के दर्द का थोड़ा भी आभास न था. उसे लग रहा था कि मां बेहोश होने का नाटक कर रही है. मां की लाश को धक्के देकर उठ जाने व रुपये देने के लिए कहता रहा. जब काफी देर तक मां नहीं हिली, तो वह चीखने लगा, जोर-जोर से रोने लगा. शोर सुन कर बाहर के लोग जुट गये. लोगों ने देखा : मां की लाश के पास 33 वर्षीय शिव शंकर दे पागलों की तरह हरकतें कर रहा था. कुछ भी करने से बेहतर लोगों...

एक मिस्ड कॉल, फिर प्यार, शादी और सौदा

-मिस कॉल्स से करता था दोस्ती, करता था प्यार का नाटक, फिर शादी -बिकने के पहले ही एक होटल के पास से रिहा करायी गयी किशोरी -बहला-फुसला कर उसे भगाने वाला आरोपी युवक भी हुआ गिरफ्तार   विकास गुप्ता, कोलकाता --------------------------- मिस कॉल से किशोरी को फंसा कर उसे बहला फुसला कर नारी तस्करों के पास बेचने की कोशिश के पहले ही पुलिस ने आरोपी युवक को गिरफ्तार कर लिया. घटना गरफा इलाके के मंडल पाड़ा में रविवार देर रात घटी. गिरफ्तार युवक का नाम सुमन दे (25) है. वह अजय नगर का रहने वाला है. गरफा व आसपास के इलाके में रविवार देर रात छापेमारी के दौरान पीड़िता को रिहा कराया गया. पुलिस ने वहां से आरोपी को भी गिरफ्तार कर लिया है. युवती को मिस कॉल देकर उससे दोस्ती करने के दौरान प्यार के जाल में फंसा कर शादी के नाम पर भगा कर ले जाकर नारी तस्करों के पास किशोरी को बेचने की साजिश रचने का आरोप उस पर लगा है. पुलिस के मुताबिक मंडल पाड़ा की रहने वाली 16 वर्षीय एक किशोरी गत दो दिनों से घर से लापता थी. आसपास के इलाके में उसकी तलाश करने के बावजूद उसका कोई सुराग नहीं मिला. अंत में किशोरी की मां शुक्ला मंडल ने बेट...

अरे, ये क्या ! जो सोचता, वही हो जाता

एक बार एक आदमी घूमते-घामते स्वर्ग पहुँच गया. स्वर्ग में सुंदर नजारे देखते हुए वह बहुत देर तक घूमता रहा और अंत में थक हार कर एक वृक्ष के नीचे सो गया. स्वर्ग में जिस वृक्ष के नीचे सोया था, वह कल्पतरू था. कल्पतरू की छांह के नीचे बैठ कर जो भी व्यक्ति जैसी कल्पना करता है, वह साकार हो जाता है. कुछ देर बाद जब उस आदमी की आँख खुली तो उसकी थकान तो जाती रही थी, मगर उसे भूख लग आई थी. उसने सोचा कि काश यहाँ छप्पन भोग से भरी थाली खाने को मिल जाती तो आनंद आ जाता. चूंकि वह कल्पतरू के नीचे था, तो उसकी छप्पन भोग से भरी थाली उसके कल्पना करते ही प्रकट हो गई. चूंकि उसे भूख लगी थी तो उसने झटपट उस भोजन को खा लिया. भोजन के बाद उसे प्यास लगी. उसने सोचा कि काश कितना ही अच्छा होता कि इतने शानदार भोजन के बाद एक बोतल बीयर पीने को मिल जाती. उसका यह सोचना था कि बीयर की बोतल नामालूम कहाँ से प्रकट हो गई. उसने बीयर की बोतल खोली और गटागट पीने लगा. भूख और प्यास थोड़ी शांत हुई तो उसका दिमाग दौड़ा. यह क्या हो रहा है उसने सोचा. क्या मैं सपना देख रहा हूँ? खाना और बीयर हवा में से कैसे प्रकट हो गए? लगता है कि इस पेड़...

क्या मेरा वेतन बढ़ेगा?

प्रेरक सम्मेलन (मोटिवेशन सेमिनार) से लौटकर उत्साहित प्रबंधक ने अपने एक कामगार को अपने ऑफ़िस में बुलाया और कहा – “आज के बाद से अपने काम को तुम स्वयं प्लान करोगे और नियंत्रित करोगे. इससे तुम्हारी उत्पादकता बढ़ेगी.” “इससे क्या मेरे वेतन में बढ़ोत्तरी होगी?” कामगार ने पूछा. “नहीं नहीं, -” प्रबंधक आगे बोला – “पैसा कहीं भी प्रेरणा देने का कारक नहीं बनता और वेतन में बढ़ोत्तरी से तुम्हें कोई संतुष्टि नहीं मिलेगी.” “ठीक है, तो जब मेरी उत्पादकता बढ़ जाएगी तब मेरा वेतन बढ़ेगा?” “देखो, -” प्रबंधक ने समझाया “जाहिर है कि तुम मोटिवेशन थ्योरी को नहीं समझते. इस किताब को ले जाओ और इसे अच्छी तरह से पढ़ो. इसमें सब कुछ विस्तार में समझाया गया है कि किस चीज से तुममें प्रेरक तत्व जागेंगे.” वह आदमी बुझे मन से किताब ले कर जाने लगा. जाते जाते उसने पूछा - “यदि मैं इस किताब को अच्छी तरह से पूरा पढ़ लूं तब तो मेरा वेतन बढ़ेगा?”

सबकुछ ठीक था, पर ये क्या ?

एक प्राचीन दृष्टान्त है. तब ईश्वर मनुष्यों के साथ धरती पर निवास करते थे. एक दिन एक वृद्ध किसान ने ईश्वर से कहा – आप ईश्वर हैं, ब्रह्माण्ड को आपने बनाया है, मगर आप किसान नहीं हैं और आपको खेती किसानी नहीं आती, इसलिए दुनिया में समस्याएँ हैं. ईश्वर ने पूछा – “तो मुझे क्या करना चाहिए?” किसान ने कहा - “मुझे एक वर्ष के लिए अपनी शक्तियाँ मुझे दे दो. मैं जो चाहूंगा वो हो. तब आप देखेंगे कि दुनिया से समस्याएँ, गरीबी भुखमरी सब समाप्त हो जाएंगी.” ईश्वर ने किसान को अपनी शक्ति दे दी. किसान ने चहुँओर सर्वोत्तम कर दिया. मौसम पूरे समय खुशगवार रहने लगा. न आँधी न तूफ़ान. किसान जब चाहता बारिश हो तब बारिश होती, जब वो चाहता कि धूप निकले तब धूप निकलती. सबकुछ एकदम परिपूर्ण हो गया था. चहुँओर फ़सलें भी लहलहा रही थीं. जब फसलों को काटने की बारी आई तब किसान ने देखा कि फसलों में दाने ही नहीं हैं. किसान चकराया और दौड़ा दौड़ा भगवान के पास गया. उसने तो सबकुछ सर्वोत्तम ही किया था. और यह क्या हो गया था. उसने भगवान को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा. भगवान ने स्पष्ट किया – चूंकि सबकुछ सही था, कोई संधर्ष नहीं था, कोई ...

कलाम ! आप तो कमाल हैं ः बॉस हो तो एेसा

थुम्बा में रॉकेट प्रक्षेपण स्टेशन पर वैज्ञानिक एक दिन में लगभग 12 से 18 घंटे के लिए काम करते थे. इस परियोजना पर काम कर रहे वैज्ञानिकों कि संख्या सत्तर के लगभग थी . सभी वैज्ञानिक वास्तव में काम के दबाव और अपने मालिक की मांग के कारण निराश थे, लेकिन हर कोई उससे वफादार था और नौकरी छोड़ने के बारे में नहीं सोचता था . एक दिन, एक वैज्ञानिक अपने बॉस के पास आया था और उनसे कहा - सर, मैं अपने बच्चों को वादा किया है कि मैं उन्हें हमारी बस्ती में चल रही प्रदर्शनी दिखाने के लिए ले जाऊँगा . तो मैं 5 30 बजे कार्यालय छोड़ना चाहता हूँ . उनका बॉस ने कहा - ठीक है, तुम्हे आज जल्दी कार्यालय छोड़ने के लिए अनुमति दी जाती है. वैज्ञानिक ने काम शुरू कर दिया. उसने दोपहर के भोजन के बाद भी अपना काम जारी रखा. हमेशा की तरह वह इस हद तक अपने काम में मशगूल था कि जब उसने अपनी घड़ी में देखा कि समय रात्रि 8.30 बज चुके थे . अचानकउसे अपना वह वादा जो उसने अपने बच्चों को किया था याद आया . उसने अपने मालिक के लिए देखा, वह वहाँ नहीं था. उसे सुबह ही बताया था, उसने सब कुछ बंद कर दिया और घर के लिए चल दिया. अपने भीतर गहराई...

वह अकेला हो जाता, इसीलिए मार दिया

विकास गुप्ता, कोलकाता ------------------------- मेरे जाने के बाद मेरा बेटा अकेला हो जाता, इसीलिए मैंने बेटे की जान पहले ले ली. वारदात स्थल से मिले पत्र में कुछ ऐसा ही लिखा था.  वारदात दिल दहला देने वाली है, जिसमें एक मां ने पहले अपने पांच वर्षीय बेटे का गला घोंट दिया और फिर धारदार हथियार (बोटी) से खुद का गला रेत लिया. उसने अपने शरीर की कई नसें भी काट लीं. अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने बेटे को मृत घोषित कर दिया, जबकि महिला की हालत नाजुक बनी हुई है. घटना दक्षिण कोलकाता के सव्रे पार्क इलाके के बैकुंठ साहा रोड में रविवार तड़के तीन बजे के करीब घटी. महिला का नाम देवजानी चौधरी (42) है. पुलिस के मुताबिक देवजानी के कमरे से मिले कागज में उसने बीमारी से परेशान होने के कारण ऐसा कदम उठाने की बात कही है. उसने घटना के लिए किसी को जिम्मेवार नहीं ठहराया है. देहरादून से आकर भाई के घर रुकी थी देवजानी के भाई दीपंकर राय ने पुलिस को बताया कि उसकी बहन देवजानी का विवाह देहरादून में डीआरडीओ के कंप्यूटर साइंस का काम करने वाले देवाशीष चौधरी के साथ हुई थी. शादी के बाद दोनों वहीं रह रहे थे. विवाह के बाद देवां...

उसने दस कुएं खोद डालें

एक आदमी को किसी ने सुझाव दिया कि दूर से पानी लाते हो, क्यों नहीं अपने घर के पास एक कुआं खोद लेते? हमेशा के लिए पानी की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा। सलाह मानकर उस आदमी ने कुआं खोदना शुरू किया। लेकिन सात-आठ फीट खोदने के बाद उसे पानी तो क्या, गीली मिट्टी का भी चिह्न नहीं मिला। उसने वह जगह छोड़कर दूसरी जगह खुदाई शुरू की। लेकिन दस फीट खोदने के बाद भी उसमें पानी नहीं निकला। उसने तीसरी जगह कुआं खोदा, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। इस क्रम में उसने आठ-दस फीट के दस कुएं खोद डाले, पानी नहीं मिला। वह निराश होकर उस आदमी के पास गया, जिसने कुआं खोदने की सलाह दी थी। उसे बताया कि मैंने दस कुएं खोद डाले, पानी एक में भी नहीं निकला। उस व्यक्ति को आश्चर्य हुआ। वह स्वयं चलकरउस स्थान पर आया, जहां उसने दस गड्ढे खोद रखे थे। उनकी गहराई देखकर वह समझ गया। बोला, 'दस कुआं खोदने की बजाए एक कुएं में ही तुम अपना सारा परिश्रम और पुरूषार्थ लगाते तो पानी कबका मिल गया होता। तुम सब गड्ढों को बंद कर दो, केवल एक को गहरा करते जाओ, पानी निकल आएगा।' कहने का मतलब यही कि आज की स्थिति यही है। आदमी हर काम...

काँच की बरनी और दो कप चाय

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है । दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई...फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये , धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर से प् ?? ोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , ...

मत बदलो कह कर उसने बदल दिया

वर्षों तक मैं मानसिक रोगी रहा - चिंताग्रस्त, अवसादग्रस्त और स्वार्थी। हर कोई मुझे अपना स्वभाव बदलने को कहता । मैं उन्हें नाराज करता, पर उनसे सहमत भी था। मैं अपने आपको बदलना चाहता था लेकिन अपने तमाम प्रयासों के बावजूद मैं चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाया। मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती थी जब दूसरों की तरह मेरे सबसे नजदीकी मित्र भी मुझसे बदलने को कहते। मैं ऊर्जारहित और बंधा-बंधा सा महसूस करता । एक दिन उसने कहा - "अपने आप को मत बदलो। तुम जैसे भी हो मुझे प्रिय हो।" ये शब्द मेरे कानों को मधुर संगीत की तरह लगे - "मत बदलो, मत बदलो, मत बदलो ............. तुम जैसे भी हो मुझे प्रिय हो।" मैंने राहत महसूस की। मैं जीवंत हो उठा और अचानक मैंने पाया कि मैं बदल गया हूँ। अब मैं समझ गया हूँ कि वास्तव में, मैं तब तक नहीं बदला था जब तक कि मैंने ऐसे व्यक्ति को नहीं खोज लिया जो मुझसे हर हाल में प्रेम करता हो।

2 short n interesting stories

सुरक्षा का उपाय एक बार नसरूद्दीन ने एक लड़के से उसके लिए कुँऐं से पानी खींचने का अनुरोध किया। जैसे ही वह लड़का कुँए से पानी खींचने को झुका, नसरूद्दीन ने उसके सिर में जोर से थप्पड़ मारा और कहा, "ध्यान रहे। मेरे लिए पानी खींचते समय घड़ा न टूटे।" वहाँ से गुजरते हुए एक राहगीर ने यह सब देखा तो उसने नसरूद्दीन से कहा - "जब उस लड़के ने कोई गल्ती ही नहीं की तो तुमने उसे क्यों मारा?" नसरूद्दीन ने दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया - "यदि मैं यह चेतावनी घड़े के फूटने के बाद देता तो उसका कोई फायदा नहीं होता।" ----------------------------------   एक मिनट की भी देरी किसलिए? एक बार एक जंगल में जबरदस्त आग लग गई और जंगल का एक बड़ा हिस्सा जलकर खाक हो गया. जंगल में एक गुरु का आश्रम था. जब जंगल की आग शांत हुई तो उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया और उन्हें आज्ञा दी कि जंगल को फिर से हरा भरा करने के लिए देवदार का वृक्षारोपण किया जाए. एक शक्की किस्म के चेलने ने शंका जाहिर ही - मगर गुरूदेव, देवदार तो पनपने में बरसों ले लेते हैं. यदि ऐसा है तब तो हमें बिना देरी किए तुरंत ही यह काम शुरू ...

very short story कौन बड़ा?

कौन बड़ा? एक बार एक आश्रम के दो शिष्य आपस में झगड़ने लगे – मैं बड़ा, मैं बड़ा. झगड़ा बढ़ता गया तो फैसले के लिए वे गुरु के पास पहुँचे. गुरु ने बताया कि बड़ा वो जो दूसरे को बड़ा समझे. अब दोनों नए सिरे से झगड़ने लगे – तू बड़ा, तू बड़ा!

बाद में बात करेंगे

सूफी संत जुनैद के बारे में एक कथा है. एक बार संत को एक व्यक्ति ने खूब अपशब्द कहे और उनका अपमान किया. संत ने उस व्यक्ति से कहा कि मैं कल वापस आकर तुम्हें अपना जवाब दूंगा. अगले दिन वापस जाकर उस व्यक्ति से कहा कि अब तो तुम्हें जवाब देने की जरूरत ही नहीं है. उस व्यक्ति को बेहद आश्चर्य हुआ. उस व्यक्ति ने संत से कहा कि जिस तरीके से मैंने आपका अपमान किया और आपको अपशब्द कहे, तो घोर शांतिप्रिय व्यक्ति भी उत्तेजित हो जाता और जवाब देता. आप तो सचमुच विलक्षण, महान हैं. संत ने कहा – मेरे गुरु ने मुझे सिखाया है कि यदि आप त्वरित जवाब देते हैं तो वह आपके अवचेतन मस्तिष्क से निकली हुई बात होती है. इसलिए कुछ समय गुजर जाने दो. चिंतन मनन हो जाने दो. कड़वाहट खुद ही घुल जाएगी. तुम्हारे दिमाग की गरमी यूँ ही ठंडी हो जाएगी. आपके आँखों के सामने का अँधेरा जल्द ही छंट जाएगा. चौबीस घंटे गुजर जाने दो फिर जवाब दो. क्या आपने कभी सोचा है कि कोई व्यक्ति पूरे 24 घंटों के लिए गुस्सा रह सकता है? 24 घंटे क्या, जरा अपने आप को 24 मिनट का ही समय देकर देखें. गुस्सा क्षणिक ही होता है, और बहुत संभव है कि आपका गुस्सा, हो स...

Capitalism: A Ghost Story

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Rockefeller to Mandela, Vedanta to Anna Hazare.... How long can the cardinals of corporate gospel buy up our protests? By Arundhati Roy March 21, 2012 " Outlook India " - - Is it a house or a home? A temple to the new India, or a warehouse for its ghosts? Ever since Antilla arrived on Altamont Road in Mumbai, exuding mystery and quiet menace, things have not been the same. “Here we are,” the friend who took me there said, “Pay your respects to our new Ruler.” Antilla belongs to India’s richest man, Mukesh Ambani. I had read about this most expensive dwelling ever built, the twenty-seven floors, three helipads, nine lifts, hanging gardens, ballrooms, weather rooms, gymnasiums, six floors of parking, and the six hundred servants. Nothing had prepared me for the vertical lawn—a soaring, 27-storey-high wall of grass attached to a vast metal grid. The grass was dry in patches; bits had fallen off in ne...