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Showing posts from August, 2014

ये चीनी नहीं बांग्ला बोलते हैं

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-मिनी चीन 'चायना टाउन' में नहीं रही वो रौनक -भाषा, संस्कृति और परंपरा को बचाये रखने की चेष्टा, अपने वजूद बचाये रखने की चुनौती  -1962 में इंडो-चीन युद्ध के दौरान हुई जमकर अत्याचार, शुरू हुआ पलायन, सरकार ने हजारों लोगों को चीन भेज दिया -चायना टाउन के हर घर का कम से कम एक व्यक्ति अब कनाडा में  राहुल मिश्रा, कोलकाता भारत में चीनी समुदाय का एक छोटा सा समूह है, जो पूरी तरह भारतीय बन चुके हैं। यह भारत की विशाल जनसंख्या के सामने अत्यंत ही छोटा है। इस छोटे से समूह ने इस विशाल भारत के लोगों के दिल में जगह बनाया हो न हो पर ये हमारे 'पेट' और लाखों महिलाओं के 'चेहरे' पर पूरी तरह से बस गये हैैं। जहां एक तरह लोकप्रिय 'चीनी चाउ' नूडल्स और चाइनीज फास्ट फूड हर नुक्कड़ पर छोटी-बड़ी दुकानों में बड़े चाउ से खाये जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ लाखों शहरी महिलाओं के चेहरे की चमक के पीछे भी इस समुदाय की महिलाओं का हाथ रहता है, जिनका ब्यूटी पार्लर करीबन हर इलाके में मिल जाते हैं। भारत के अभिन्न अंग बन चुके इस समुदाय का एक बड़ा हिस्सा महानगर के टेंगरा इलाका स्थित 'चायना टा...

मुश्किलों को मात दे जीना सिखाता 'डेनÓ

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-जिंदगी के 25 वर्षों तक नहीं बोल पाने वाला बना रेडियो जाकी राहुल मिश्रा, कोलकाता 'जीवन जीने के लिए है और जीना चाहते हैं तो तकलीफें आएंगी ही। अगर उनका सामना नहीं करेंगे तो जीने में कोई मजा नहीं है। यह एक खेल की तरह है, जिसमें जीतना ही लक्ष्य होना चाहिए।Ó एफएम पर कुछ ऐसी ही प्रेरणादायक बातों को सुनकर इन दिनों बहुत से कोलकातावासियों के दिन की शुरूआत होती है। ये बातें उनके चहेते आरजे डेन कहते हैं। वह रोज सुबह छह बजे स्टूडियो में अपने व्हील चेयर पर बैठकर 'हाल छेरो ना बंधुÓ कहकर अपने श्रोताओं को जगाते हंै, जो उसके शो का नाम भी है, जिसका मतलब 'हौसला मत छोड़ोÓ है। शारीरिक रूप से विकलांग डेन ने कभी हार नहीं मानी। उनकी जिंदगी बेहद संघर्षपूर्ण रही है। वे डोपा रिस्पान्सिव डिस्टोनिया (डीआरडी) नामक घातक बीमारी से पीडि़त हैं। वह हर रोज सुबह 6 से 7 बजे तक अपनी संघर्षपूर्ण जिंदगी व अनुभवों को बांटकर सुनने वालों का हौसला बुलंद करते हैैं। डेन बताते हैं, 'बचपन में दूरदर्शन पर प्रणय राय के शो 'द वल्र्ड दिस वीकÓ देखकर काफी प्रेरणा मिलती थी। उनकी तरह मीडिया में आना चाहते थे। 91.9 फ्रेन्ड्...

घुट-घुट के सहते हैं बीवियों के सितम

इज्जत की खातिर घरेलू हिंसा का शिकार होते रहते हैं पुरुष राहुल मिश्रा, कोलकाता पति व सास की रोज-रोज पिटाई व प्रताड़ना से गृहवधु का जीना दुश्वार हो गया है। ये शब्द अक्सर सुनने को मिलते हैं। पर कहीं ये सुनने को नहीं मिलता कि किसी महिला ने अपने पति और सास का जीना दुश्वार कर रखा है। क्यों? क्या ऐसा नहीं होता। होते हैं लेकिन पुरूष प्रधान समाज होने के कारण ये बातें घर से बाहर समाज में नहीं पहुंच पाती। पुरुष खानदान की इज्जत की खातिर समझौता कर घरेलू हिंसा का शिकार होते रहते हैं। यही कारण है कि घरेलू हिंसा के शिकार होने वाले पुरुषों के लिये कुछ समाजसेवी संगठन बन रहे हैं। इन संगठनों के मुताबिक बेचारा आदमी अगर औरत पर हाथ उठाए तो जालिम, अगर औरत से पिट जाए तो बुजदिल, औरत को किसी के साथ देख लड़ाई करते ईष्र्यालु, चुप रहे तो बेगैरत घर के बाहर रहे तो आवारा, घर में रहे तो नकारा बच्चों को डांटे तो जालिम, न डांटे तो लापरवाह औरत को नौकरी से रोके तो शकी मिजाज न रोके तो बीवी की कमाई खाने वाला मां की माने तो मां का चमचा, बीवी की सुने तो जोरू का गुलाम। इसके बाद भी अपनी तकलीफ किसी से बता नहीं सकता। अ...

.. तो भारत बनेगा सबसे अच्छा

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आज भी सही मायने में गणतंत्र की सार्थकता से मीलों दूर हैं। तंत्र (सिस्टम) गण (जनता) के लिए स्थापित हुआ। पर, वह चंद हाथों की कठपुतली बन कर अंधेरे में गुम होती गई। अमीर तो पहले से ही फायदे में थे, लेकिन गरीब को कुछ न मिल सका। धनी और धनवान होते गए, गरीब और गरीब होते गए। यही वजह है कि आज भी काफी लोग एक जून की रोटी के लिए परेशान हैं। अशिक्षा, गरीबी, घर, कपड़े, रोजगार के लिए तरस रहे हैं। लोगों का ही विकास नहीं हुआ तो देश कहां से आगे बढ़ेगा। कुछ हद तक शिक्षित मध्यम वर्ग को कुछ लाभ मिला। यह दुर्भाग्यजनक है कि आज अंग्रेजी मीडियम से पढ़े-लिखे बच्चों को ही आगे बढ़ने का बेहतर मौका मिलता है, लेकिन जो अशिक्षित हैं उनके लिए क्या हो रहा है? सरकारी फाइलों में बहुत कुछ होता है, लेकिन तंत्र रूपी महाजाल से निकलते-निकलते रास्ते में ही दम तोड़ देता है। मैं अब 80 की उम्र पार कर चुकी हूं। सोचती हूं कि वर्तमान सरकार जो सोशलिस्ट मानी जा रही है, भोजन की कमी, भूमिहीनता, गरीबी जैसी समस्याओं के निदान में सफल नहीं हो सकी है। वन, नदी, झरना जैसे प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए बुनियादी सभ्य रवैया नहीं अपनाया जा रहा।...

इनका दर्द देख बीमारी को होता है अपराधबोध!

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 -गरीब के लिए महंगा व मिलावटी है चिकित्सा -सत्ता के कुछ ही दिनों मुख्यमंत्री ने देखा बदहाली का मंजर  राहुल मिश्रा, कोलकाता  गत कुछ दिनों में बंगाल ने देशभर में खूब सुर्खियां बटोरी। राजनीति, दोषारोपण और बहस का बाजार भी गर्म रहा। इसका पूरा श्रेय राज्य की बेहद बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को जाता है, जिसका शिकार सिर्फ आम गरीब जनता ही होती है। चिकित्सा के नाम पर जगह-जगह पंूजीपतियों की दुकान लग जाने, बदहाल सरकारी अस्पताल व भ्रष्ट तंत्र के कारण गरीबों के लिए इलाज नकली, मिलावटी और महंगा हो गया है। इन सबके बीच बीमार मजबूर गरीब संघर्ष करते-करते दम तोड़ देता है, जिसे देख भले ही हुक्मरानों को कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन अगर बीमारी को एहसास होता तो शायद उसे खुद में अपराधबोध होता। हुगली के किसान राजू नस्कर को टीबी से ग्रसित पिता बादल नस्कर की जान नहीं बचा पाने का काफी अफसोस है। गत दिनों महानगर के एक सरकारी अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया। अपनी लाचारी को बयां करते हुए राजू कहते हैैं कि गांव के डाक्टर साहब ने पिताजी को पाइवेट नर्सिंग होम ले जाने की सलाह दी थी, लेकिन रुपये न होन...

क्लास, जहां 'क्लास' नहीं

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-एक ही बेंच पर बैठते हैैं महल व फुटपाथ दोनों के बच्चे  -कोई देता पूरी फीस, कोई आधा तो कइयों के माफ - सब को शिक्षा मुहैया कराना है मकसद राहुल मिश्रा, कोलकाता  शिक्षा के अधिकार कानून के तहत कहा गया है, सभी निजी स्कूलों में नर्सरी स्तर पर 25 फीसदी सीट आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए। इस कानून का जहां निजी स्कूलों के प्रिंसिपलों ने विरोध किया, वहीं कोलकाता के सियालदह स्थित लोरेटो स्कूल पूरे देश को अपनी नीतियों से सबक सिखा रही हैै।  इस स्कूल के आधे छात्र जहां डाक्टर, इंजीनियर, बिजनेसमैन जैसे उच्च वर्ग के बच्चे हैैं, वहीं आधे रिक्शा चालकों, फुटपाथी हाकर, घरों में मजदूरी करने वाले, भीख मांगने वाले जैसे अति निम्न वर्ग के परिवारों के बच्चे हैैं, तो कुछ अनाथ व फुटपाथ से उठाए गए हैैं। दोनों ही श्रेणी के बच्चे एक साथ कक्षा में एक ही बेंच पर बैठकर समान शिक्षा ग्रहण करते हैैं, साथ में खेलने, पढऩे के साथ खाना भी खाते हैैं।  इस स्कूल में करीब 1400 छात्र हैैं, जिनमें से सिर्फ 450 छात्र हैं, जो पूरा फीस देते हैैं, जबकि आधा से अधिक ऐसे छात्र है ज...

आधी रात के बाद सजती है रजिया की दुकान

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राहुल मिश्रा, कोलकाता  कहते हैैं मां का दिल सबसे कोमल होता है और अपने बच्चे की हिफाजत के लिए वह पूरी दुनिया से लड़ सकती है। यह बात आधी रात को महानगर की सुनसान सड़क पर अपने बेटे को दुलारती, पुचकारती एक मां को देखने और उसकी कहानी सुनने के बाद नकारा नहीं जा सकता। रजिया सुल्तानी एक 26 वर्षीया मां हैै। उसमें अपने बेटे जावेद के लिए जितना 'मांÓ का प्यार है, उतना ही एक 'बेबस युवतीÓ की नफरत समाज और दुनिया के लोगों से हैै, जिनसे उसे जिन्दगी भर ठोकरे ही मिली। उन ठोकरों ने रजिया के सीने को इतना मजबूत बना दिया कि आज उसके सामने दर्द कोई मायने नहीं रखता। रजिया की यही हिम्मत उसे चांदनी चौक इलाके की सुनसान सड़क पर अपने बेटे जावेद के साथ पूरी रात बिताने में मदद करती है।  जब महानगर के हर घर की बत्तियां बुझ जाती हैं और लोग बिस्तर पर अपने बच्चों के साथ सोने की तैयारी में जुट जाते हैैं, तब रजिया अपने जिगर के टुकड़े के साथ अपनी दुकान सजाती है। जब कीचन रूम का दरवाजा बंद होता है, तो रजिया चूल्हे में आग फूंकती है।  रजिया बताती है, एक साल पहले अपने बेटे के साथ कोलकाता आयी। यहां आने के...