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Showing posts from November, 2014

झाड़ुओं की महासभा में बवाल

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राहुल मिश्र, कोलकाता  ------------------- देश में अचानक से बढ़ी पूछ और मिली इज्जत के कारण कुछ झाड़ुओं का दिमाग सातवें आसमान पर हैं. उनमें श्रेय लेने की होड़ सी मची है. एक तरफ मोदी झाड़ू कहता फिर रहा है कि सारा मान मेरी वजह से मिला है, क्योंकि गांधी जयंती पर मुङो ही प्रधानमंत्री ने अपने हाथों में लेकर स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी. वहीं केजरी झाड़ू कह रहा है कि आम आदमी पार्टी का चुनाव चिह्न बन कर इसकी शुरुआत मैंने की, जब दिल्ली से लेकर पूरे देश में पार्टी के समर्थक झाड़ू लेकर निकलते थे. वहीं नगर निगम व नगर पालिका झाड़ुओं ने दोनों झाड़ुओं की दावेदारी पर कड़ी आपत्ति जतायी है, उनका कहना है ये लोग सिर्फ सुर्खियां बटोरने में लगे हैं, असली काम तो वर्षो से हम लोग करते आ रहे हैं. झाड़ुओं के बीच इस तरह की बयानबाजी और विवाद को बड़े-बुजुर्ग-बुद्धिजीवी झाड़ुओं ने गंभीरता लिया और रामलीला मैदान में महासभा बुलायी. सहासभा में देश भर से रेल व ट्रकों में लद-लद कर भारी संख्या में झाड़ू पहुंचे. कोई आम आदमी पार्टी की टोपी लगाये था, तो कोई भगवा पट्टी धारे. कई ग्लैमरस भी थे तो कइयों की रईसी...

मन मार कर क्या जीना

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ये खुशमिजाजी, खुलापन, जिंदा रखता है बालपन । ये खिलखिलाना, चहक जाना, नहीं चाहता इन्हें मारना । ये अहम, इज्जत, अहमियत, बिना मोहब्बत बेकीमत । लोगों का क्या, कुछ तो कहेंगे ही, उनकी बातों से क्या दिल दुखाना । गंभीरता के घेरे में गम घेरता है, मुखौटे चढ़ा कर क्या रहना । दिल की बात जुबान पर आये, दबा कर क्यों बोझ बढ़ाना । मन है इश्वर, मन ही अल्लाह, मन मार कर क्या जीना । -राहुल मिश्रा 

नींद से जागे श्रीहरि और दो मांओं की कोख से जन्मा जरासंध

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बिहार के राजगीर में अाज भी मौजूद है ऐतिहासिक जरासंध अखाड़ा, जहां कभी मल्लयुद्ध के दौरान पांडव भीमसेन ने श्रीकृष्ण के इशारे पर मगध सम्राट जरासंध का वध किया था. द्वापर युग में महाभारत से पहले पांडव भीमसेन मल्लयुद्ध के दौरान मगध सम्राट जरासंध को पटखनी देते हुए ।  देवोत्थान एकादशी को ही दो रानियों से आधा-आधा पैदा हुआ था जरासंध आज भी मगध समाज जरासंधेश्वर जयंती को बतौर जेठान पर्व मनाता है. क्या आप जानते हैं, हमारे पौराणकि ग्रंथ व ऐतिहासिक दस्तावेज ऐसे पात्नों, योद्धाओं व विभूतियों से भरे पड़े हैं, जिन्हें जनमानस उनकी नकारात्मक भूमिका के लिए ही जानता-समझता आया है. पर ऐसे विभूतियों के व्यक्तित्व का एक और पक्ष भी है, जिसे देश-समाज के ज्यादातर लोग नहीं जानते. ऐसी विभूतियों या योद्धाओं को आज भी कतिपत जातियां-जनजातियां ना सिर्फ आदर्श मानती हैं, बल्कि उन्हें विधिवत पूजती हैं. उसे परवाह नहीं है कि धर्म-पुराण या आज के धर्म-गुरु   ऐसी विभूतियों को कैसे व किस रूप में परिभाषित करते हैं. हाल में पता चला कि आज भी मिहषासुर को पूजनेवाले हैं, जो ऐसे ही कितने दैत्यों या नकारात्मक किरदारों को सदियों से...