Posts

चुप हो गयी एक सत्याग्रही की आवाज

Image
डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र, वरिष्ठ साहित्यकार आठ दशक की लोकयात्रा पूरी कर ली थी अशोकजी ने. यानी बुढ़ौती तो आ ही गयी थी, मगर अशोकजी की जीवनप्रियता और रचनात्मक सक्रियता पूरी तरह जवान थी. इसलिए उनका यकायक आंख मूंद कर सदा के लिए चुप हो जाना कदाचार के सघन तमस् से निरंतर आहत दुनिया के निरूपाय लोगों के लिए असाधारण त्रसदी है, जैसे एक बड़ा सहारा अदृश्य हो गया, जैसे सुरक्षा की आश्वस्ति का आत्मीय संबल टूट गया. नियति की त्रसद लीला अशोकजी के निजी स्तर पर लगभग दो दशकों से नाना रूपों में क्रियाशील थी. अनेक आत्मीय चरित्रों के वियोग-दंश को निरूपाय मुद्रा में अशोकजी ङोल रहे थे. मां के जाने के बाद सारा ममत्व बहनों से जुड़ गया था, जो एक-एक कर संसार से चली गयीं. पिताजी के परलोक गमन के बाद शायद बुढ़ौती का अहसास होने लगा था. और छोटे भाई दिलीप सेकसरिया की मृत्यु ने अशोकजी को निपट अकेला बना दिया. पिछले कुछ दिनों से अशोकजी अधिक उदास रहने लगे थे. मगर युवा मित्र वार्ता-संपादक सुनील, जिनकी मृत्यु ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया था. और फिर ज्योत्सना मिलन का यकायक संसार छोड़ना, ज्येष्ठ बंधु कृती-संपादक नारायण दत्तजी की आकस्म...

अब भारत के जेल में कैदी कर सकेंगे सेक्स

जेल में बंद कैदियों को भी अब अपने पति या पत्नी से यौन संबंध बनाने का अधिकार मिलेगा। ये ऐतिहासिक फैसला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सुनाया है। कोर्ट ने एक कमेटी बनाने का आदेश दिया है जो तय करेगा कि किस तरह के कैदियों को और किस परिस्थिति में ये अधिकार दिया जाए। एक कैदी पति-पत्नी के मामले में फैसला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि जेल में बंद कैदी को अपने पति या पत्नी से यौन संबंध बनाने और बच्चे पैदा करने का अधिकार है। संविधान के मुताबिक ये एक मौलिक अधिकार है और कैदियों को इससे वंचित नहीं रखा जा सकता। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया जाए। कमेटी जेलों की हालत को समझकर एक दिशा-निर्देश बनाएगी। कमेटी ये तय करेगी कि किस तरह के कैदियों को और किस परिस्थिति में ये अधिकार दिया जाएगा। जेल के अंदर सुविधा बनाई जाएगी जहां कैदी की पत्नी या उसका पति उससे मिल सके। कोर्ट ने ये साफ किया है कि किस कैदी को ये अधिकार दिया जाएगा, ये सरकार तय करेगी। इसमें सामाजिक सरोकार और कानून व्यवस्था का ख्याल रखा जाएगा। कोर्ट के मुताबिक हर व्यक्ति को अपने खा...

एक इतालवी, जिस पर नाज़ करता है राजस्थान

Image
बीकानेर में एल पी तेसीतोरी की समाधि - थार के इतालवी साधक थे एलपी तेस्सीतोरी -बीकानेर रियासत पर बिखरे हुए दुर्लभ शोध संग्रह को सहेजने की जरूरत रमेश द्विवेदी ज़रा सोचिए कि आज से 127 साल पहले सुदूर देश इटली में एक व्यक्ति को संस्कृत व हिंदी सीखते-पढ़ते हुए राजस्थान से इस क़दर लगाव हो जाता है कि नियति उसे उसकी मनपसंद जगह राजस्थान खींच लाती है और वहां रहते हुए महज साढ़े पांच साल के कार्यकाल में वह शख्स राजस्थानी भाषा-साहित्य-संस्कृति-इतिहास को इतना कुछ दे जाता है, जो एक परिपक्व व्यक्ति के लिए भी पूरे जीवन-काल में असंभव है. बात हो रही है महज 23 वर्ष की उम्र में इटली से राजस्थान आये लुइज पियो तेस्सीतोरी की, जिसे अगर पूरा भारत नहीं, तो कम से कम समूचा राजस्थान, ‘थार के इतालवी साधक’ के रूप में जानता-पहचानता है. यह बात पिछले दिनों दि एशियाटिक सोसाइटी, कोलकाता और राजस्थानी प्रचारिणी सभा की ओर से संयुक्त रूप से यहां आयोजित एल-पी तेस्सीतोरी व्याख्यानमाला के दौरान उभर कर सामने आयी. इस दौरान बीज भाषण देते हुए जनसत्ता, दिल्ली के संपादक ओम थानवी ने इतालवी विद्वान पर अपने अनौपचारिक अध्ययन के हवाले से जोर द...

बस यूं ही

इस बार तो गुस्सा इतना था कि बात न करने की कसम खा ली। पर जब वो मुस्कुराता हुआ आया तो,  सारी कसमें टूट गयीं दे करके गाली। ----- मेरी ख़ामोशी को बेरुखी न समझ,  चुप्पी में भी तुम्हारा ही जिक्र मिलेगा। --- दिल न तोड़ने के चक्कर में  बार-बार टूटता चला गया ।  उनकी ख़ुशी की खातिर,  खुद से रूठता चला गया। ----- ऐसे ऐसे फरेबियों से पड़ा है पाला कि इनदिनों खुद पर भी यकीं होता नहीं

Doctor by day, musician and writer by night

Image
Kolkata: The scalpel gives way to a harmonium and the surgeon in 80-year-old Samir K Gupta steps aside for the artist as he gives musical life to some poems of 'Gitanjali' by Nobel laureate Rabindranath Tagore. Gupta, who runs a city orthopaedic clinic, is a devoted doctor during the day and spends long hours of his nights composing music and writing books. " 'Gitanjali' has 157 poems, of which Tagore had given music to 85. The music to one was given by the iconic Shantideb Ghosh while I have given tunes to the remaining 71," Gupta told IANS. Samir K Gupta runs a clinic, is a devoted doctor and spends long hours composing music and writing books. "Noted Rabindra Sangeet exponents including Arghya Sen and Promita Mallik have rendered their voice to my tunes," he added. Mallik said: "In spite of being a very busy doctor, he has done a commendable job. I enjoyed singing the songs. Tagore is beyond comparison, but I think Gupta has done j...

झाड़ुओं की महासभा में बवाल

Image
राहुल मिश्र, कोलकाता  ------------------- देश में अचानक से बढ़ी पूछ और मिली इज्जत के कारण कुछ झाड़ुओं का दिमाग सातवें आसमान पर हैं. उनमें श्रेय लेने की होड़ सी मची है. एक तरफ मोदी झाड़ू कहता फिर रहा है कि सारा मान मेरी वजह से मिला है, क्योंकि गांधी जयंती पर मुङो ही प्रधानमंत्री ने अपने हाथों में लेकर स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी. वहीं केजरी झाड़ू कह रहा है कि आम आदमी पार्टी का चुनाव चिह्न बन कर इसकी शुरुआत मैंने की, जब दिल्ली से लेकर पूरे देश में पार्टी के समर्थक झाड़ू लेकर निकलते थे. वहीं नगर निगम व नगर पालिका झाड़ुओं ने दोनों झाड़ुओं की दावेदारी पर कड़ी आपत्ति जतायी है, उनका कहना है ये लोग सिर्फ सुर्खियां बटोरने में लगे हैं, असली काम तो वर्षो से हम लोग करते आ रहे हैं. झाड़ुओं के बीच इस तरह की बयानबाजी और विवाद को बड़े-बुजुर्ग-बुद्धिजीवी झाड़ुओं ने गंभीरता लिया और रामलीला मैदान में महासभा बुलायी. सहासभा में देश भर से रेल व ट्रकों में लद-लद कर भारी संख्या में झाड़ू पहुंचे. कोई आम आदमी पार्टी की टोपी लगाये था, तो कोई भगवा पट्टी धारे. कई ग्लैमरस भी थे तो कइयों की रईसी...

मन मार कर क्या जीना

Image
ये खुशमिजाजी, खुलापन, जिंदा रखता है बालपन । ये खिलखिलाना, चहक जाना, नहीं चाहता इन्हें मारना । ये अहम, इज्जत, अहमियत, बिना मोहब्बत बेकीमत । लोगों का क्या, कुछ तो कहेंगे ही, उनकी बातों से क्या दिल दुखाना । गंभीरता के घेरे में गम घेरता है, मुखौटे चढ़ा कर क्या रहना । दिल की बात जुबान पर आये, दबा कर क्यों बोझ बढ़ाना । मन है इश्वर, मन ही अल्लाह, मन मार कर क्या जीना । -राहुल मिश्रा 

नींद से जागे श्रीहरि और दो मांओं की कोख से जन्मा जरासंध

Image
बिहार के राजगीर में अाज भी मौजूद है ऐतिहासिक जरासंध अखाड़ा, जहां कभी मल्लयुद्ध के दौरान पांडव भीमसेन ने श्रीकृष्ण के इशारे पर मगध सम्राट जरासंध का वध किया था. द्वापर युग में महाभारत से पहले पांडव भीमसेन मल्लयुद्ध के दौरान मगध सम्राट जरासंध को पटखनी देते हुए ।  देवोत्थान एकादशी को ही दो रानियों से आधा-आधा पैदा हुआ था जरासंध आज भी मगध समाज जरासंधेश्वर जयंती को बतौर जेठान पर्व मनाता है. क्या आप जानते हैं, हमारे पौराणकि ग्रंथ व ऐतिहासिक दस्तावेज ऐसे पात्नों, योद्धाओं व विभूतियों से भरे पड़े हैं, जिन्हें जनमानस उनकी नकारात्मक भूमिका के लिए ही जानता-समझता आया है. पर ऐसे विभूतियों के व्यक्तित्व का एक और पक्ष भी है, जिसे देश-समाज के ज्यादातर लोग नहीं जानते. ऐसी विभूतियों या योद्धाओं को आज भी कतिपत जातियां-जनजातियां ना सिर्फ आदर्श मानती हैं, बल्कि उन्हें विधिवत पूजती हैं. उसे परवाह नहीं है कि धर्म-पुराण या आज के धर्म-गुरु   ऐसी विभूतियों को कैसे व किस रूप में परिभाषित करते हैं. हाल में पता चला कि आज भी मिहषासुर को पूजनेवाले हैं, जो ऐसे ही कितने दैत्यों या नकारात्मक किरदारों को सदियों से...

बंगाल में पुलिसवालों को सिंघम की जरूरत

Image
विकास गुप्ता, कोलकाता पुलिसवालों से अगर पूछें कि आपकी फेवरिट फिल्म कौन सी है, तो अधिकतर कहेंगेसिंघम, क्योंकि फिल्म में जब विलेन के सामने बाजीराव सिंघम कहता है अटा माझी सटकली, तो वे भी अपने रौब में आ जाते हैं, सीना चौड़ा हो जाता है. लेकिन पश्चिम बंगाल में वर्दीवालों को यह एहसास सिर्फ सिनेमा देखने के दौरान ही होता है, तभी तो जब जो चाहे पीट कर चला जाता है. थाने में घुस कर धमकी व अपशब्द सुना जाता है. ये सिंघम के दीवाने गोली-बम की मार भी ङोल जाते हैं और  कार्रवाई करने से पहले अपराधी की औकात पूछ लेते हैं कि कहीं उसकी पहुंच किसी नेता, मंत्री या मुख्यमंत्री तक तो नहीं. क्या पता गिरफ्तार कर ले गये तो कहीं सीएम स्वयं थाने ना आ पहुंचे और अपशब्दों से इज्जत उतार जायें. या फिर फोन पर ही कोई माई-बाप ना आ टपके. जी हां, नयी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही यह आलम है. हाल ही में एक पार्षद ने अपने समर्थकों के साथ मिल कर ट्रैफिक सर्जेट के साथ वहां मौजूद पुलिसवालों की पिटाई कर दी, क्योंकि उन्होंने नो पार्किग जोन में खड़ी टैक्सी पर केस दर्ज किया था. जब मार खाकर पुलिसवाले थाने पहुंचे तो उस पार्षद का न...

मुलायम, लालू व करुणानिधि की राह पर ममता

Image
-वंशवाद की राजनीति का स्याह पक्ष नवीन श्रीवास्तव भारतीय राजनीति में वंशवाद या भाई-भतीजावाद कोई नयी बात नहीं है. अलग-अलग समय में वंशवाद के मसले पर कांग्रेस को पानी पी पीकर कोसने वाले राजनीतिक दल भी इससे अछूते नहीं हैं. उन्हें भी यह रोग लग चुका है. सारधा घोटाले की सीबीआइ जांच, बर्दवान विस्फोट कांड की एनआइए जांच व विपक्षियों के चौतरफा हमलों से हिली पश्चिम बंगाल सरकार की मुखिया ममता बनर्जी ने भी अंतत: अपने परिवार पर ही भरोसा जताया है. अपने राजनीतिक सिपहसालार मुकुल राय व उनके करीबियों के पर कतरने के बाद उन्होंने अपने भतीजे (अभिषेक बनर्जी)का विधिवत अभिषेक किया है. अपनी पार्टी के दो युवा संगठनों तृणमूल युवा व तृणमूल यूथ कांग्रेस का विलय कर अभिषेक को उसका मुखिया बना दिया है. उन्हें भी लगने लगा है कि अभिषेक के जरिये पार्टी का चेहरा बदला जा सकता है. सवाल यह है कि क्या उनकी पार्टी में दूसरे योग्य नेताओं की कमी हो गयी है या वह भी कांग्रेस समेत दूसरे दलों की तरह भाई-भतीजावाद को ही पल्लवित और पुष्पित कर रही हैं. इससे पहले भी दूसरे दल मसलन समाजवादी पार्टी (सपा), राष्ट्रीय जनता दल (राजद), राष्ट्रवादी ...

सरिता के साथ नाइंसाफी, निंदनीय व शर्मनाक

Image
नवीन श्रीवास्तव इंचियोन एशियाई खेल में कांस्य पदक स्वीकार करने से इनकार करने वाली देश की महिला मुक्केबाज लैशराम सरिता देवी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी एसोसिएशन (एआइबीए) ने उन्हें अस्थायी तौर पर निलंबित कर दुखद व दुर्भाग्यपूर्ण कदम उठाया है. न सिर्फ सरिता उनके कोचों व इंचियोन एशियाड में भारत के दल प्रमुख पर भी इसकी गाज गिरी है. इसकी जितनी भी निंदा की जाये कम है. ऐसा कर उसने अदूरदर्शिता का परिचय दिया है. सरिता देवी को ऐसे जुर्म की सजा दी गयी है जो उन्होंने किया ही नहीं. नाइंसाफी तो उनके साथ की गयी. उन्होंने तो रेफरी के एक विवादास्पद फैसले का बस विरोध किया था. जैसा कि हम सभी जानते हैं, सरिता देवी रेफरी के खराब फैसले का शिकार बनीं. हम सबने भी अपने टीवी सेट पर उस बाउट को देखा जिसमें सरिता अपने प्रतिद्वंद्वी पर भारी पड़ रही थीं. पर रेफरी ने दक्षिण कोरिया की मुक्केबाज जिना पार्क को विजेता घोषित कर दिया. इसकी वजह से जिना रजत पदक विजेता बन गयी. रेफरी के इस एक फैसले ने सरिता के साथ-साथ करोड़ों हिंदुस्तानियों का दिल तोड़ दिया. यह हम सबके लिए दुखद था. कोई भी खेल या देश...

चांदनी रात का मजा क्यूं न हम भी लें

राहुल मिश्र प्रभात खबर, कोलकाता याद है आपको, आखिरी बार तारों से भरा आसमान कब देखा था? चांदनी रात को कभी महसूस भी किया कि नहीं ? सूर्योदय-सूर्यास्त को कब महसूस किया? आसमान में इंद्रधनुष कब देखा था ?  कब धूप में हुई बारिश में भीगा? कोयल के बोल कब सुने? पेड़ पर घोंसला और उसमें बच्चों को दाना खिलाते पक्षी को कभी देखा? ऐसे सवालों के सामने हम शहर-महानगर में रहनेवाले लोग दुखी हो जाते हैं कि कैसे हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं. उसे महसूस नहीं कर पा रहे हैं. पिछले दिनों शिक्षक दिवस पर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बच्चों से बात कर रहे थे तो असम के एक बच्चे ने उनसे जलवायु परिवर्तन को रोकने व पर्यावरण को बचाने के उपाय पूछे  थे. जवाब में उन्होंने कहा था : अब मेरे मन में एक सवाल है कि सचमुच में क्या चेंज हुआ है. हम अपने आप से पूछें. आपने देखा होगा कि हमारे गांव में जो उम्रदराज लोग होते हैं ना 70-80-85-90 के लोग सर्दियों में आप देखेंगे तो वह कहते हैं कि पिछली बार से इस बार सर्दी ज्यादा है. एक्च्यूली सर्दी ज्यादा नहीं है उनकी उम्र बढ़ने के कारण उनकी सहने की शक्ति कम हो गयी है. इसीलिए उनको ...

सनातन धर्म को लेकर शंकाओं का निवारण जरूरी

Image
रमेश द्विवेदी  आजकल देश में शिरडी के साईं बाबा को कथित रूप से भगवान जैसा माननेवाले उनके भक्तों और सनातन धर्म के आचार्यो-संतों के आचरण को लेकर भ्रामक स्थिति बनी है. सियासी हलकों से हाल में आयी कतिपय टिप्पणयिों और उन पर संत-महात्माओं की प्रतिक्रि याओं से स्थिति अिप्रय हुई है. यहां तक कि सांप्रदायिक सौहार्द के लिए देश- विदेश में माने जानेवाले शिरडी धाम के भक्तों को ‘साईंराम’ कहने से रोका जा रहा है. ऐसे में सनातम धर्म की मूल भावना और साईं बाबा की भिक्त से जुड़ी शंकाओं का निवारण जरूरी है.      भगवान आद्य शंकराचार्य ने देश के चार कोनों पर चार आश्रमों या शंकर मठों की स्थापना करते हुए विचार किया था - स्व स्व राष्ट्र प्रतिष्ठित्यै संचार: सुविधियतां अर्थात, संतजन राष्ट्र निर्माण में सदा भ्रमणशील रहें, अपनी नैतिक समीक्षा करें एवं राष्ट्र की भी समीक्षा करते हुए धर्मोपदेश एवं सदाचरण से समाज का नैतिक स्खलन रोकने को सचेष्ट रहें. इसके अलावा 12 वर्षो पर होनेवाले महाकुंभ में एकजुट होकर शास्त्नीय चिंतन-मनन एवं मंथन से देश की समस्याओं का समाधान तलाशें. फिर कुंभ समाप्ति के बाद अपने मठों ...

ये चीनी नहीं बांग्ला बोलते हैं

Image
-मिनी चीन 'चायना टाउन' में नहीं रही वो रौनक -भाषा, संस्कृति और परंपरा को बचाये रखने की चेष्टा, अपने वजूद बचाये रखने की चुनौती  -1962 में इंडो-चीन युद्ध के दौरान हुई जमकर अत्याचार, शुरू हुआ पलायन, सरकार ने हजारों लोगों को चीन भेज दिया -चायना टाउन के हर घर का कम से कम एक व्यक्ति अब कनाडा में  राहुल मिश्रा, कोलकाता भारत में चीनी समुदाय का एक छोटा सा समूह है, जो पूरी तरह भारतीय बन चुके हैं। यह भारत की विशाल जनसंख्या के सामने अत्यंत ही छोटा है। इस छोटे से समूह ने इस विशाल भारत के लोगों के दिल में जगह बनाया हो न हो पर ये हमारे 'पेट' और लाखों महिलाओं के 'चेहरे' पर पूरी तरह से बस गये हैैं। जहां एक तरह लोकप्रिय 'चीनी चाउ' नूडल्स और चाइनीज फास्ट फूड हर नुक्कड़ पर छोटी-बड़ी दुकानों में बड़े चाउ से खाये जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ लाखों शहरी महिलाओं के चेहरे की चमक के पीछे भी इस समुदाय की महिलाओं का हाथ रहता है, जिनका ब्यूटी पार्लर करीबन हर इलाके में मिल जाते हैं। भारत के अभिन्न अंग बन चुके इस समुदाय का एक बड़ा हिस्सा महानगर के टेंगरा इलाका स्थित 'चायना टा...

मुश्किलों को मात दे जीना सिखाता 'डेनÓ

Image
-जिंदगी के 25 वर्षों तक नहीं बोल पाने वाला बना रेडियो जाकी राहुल मिश्रा, कोलकाता 'जीवन जीने के लिए है और जीना चाहते हैं तो तकलीफें आएंगी ही। अगर उनका सामना नहीं करेंगे तो जीने में कोई मजा नहीं है। यह एक खेल की तरह है, जिसमें जीतना ही लक्ष्य होना चाहिए।Ó एफएम पर कुछ ऐसी ही प्रेरणादायक बातों को सुनकर इन दिनों बहुत से कोलकातावासियों के दिन की शुरूआत होती है। ये बातें उनके चहेते आरजे डेन कहते हैं। वह रोज सुबह छह बजे स्टूडियो में अपने व्हील चेयर पर बैठकर 'हाल छेरो ना बंधुÓ कहकर अपने श्रोताओं को जगाते हंै, जो उसके शो का नाम भी है, जिसका मतलब 'हौसला मत छोड़ोÓ है। शारीरिक रूप से विकलांग डेन ने कभी हार नहीं मानी। उनकी जिंदगी बेहद संघर्षपूर्ण रही है। वे डोपा रिस्पान्सिव डिस्टोनिया (डीआरडी) नामक घातक बीमारी से पीडि़त हैं। वह हर रोज सुबह 6 से 7 बजे तक अपनी संघर्षपूर्ण जिंदगी व अनुभवों को बांटकर सुनने वालों का हौसला बुलंद करते हैैं। डेन बताते हैं, 'बचपन में दूरदर्शन पर प्रणय राय के शो 'द वल्र्ड दिस वीकÓ देखकर काफी प्रेरणा मिलती थी। उनकी तरह मीडिया में आना चाहते थे। 91.9 फ्रेन्ड्...

घुट-घुट के सहते हैं बीवियों के सितम

इज्जत की खातिर घरेलू हिंसा का शिकार होते रहते हैं पुरुष राहुल मिश्रा, कोलकाता पति व सास की रोज-रोज पिटाई व प्रताड़ना से गृहवधु का जीना दुश्वार हो गया है। ये शब्द अक्सर सुनने को मिलते हैं। पर कहीं ये सुनने को नहीं मिलता कि किसी महिला ने अपने पति और सास का जीना दुश्वार कर रखा है। क्यों? क्या ऐसा नहीं होता। होते हैं लेकिन पुरूष प्रधान समाज होने के कारण ये बातें घर से बाहर समाज में नहीं पहुंच पाती। पुरुष खानदान की इज्जत की खातिर समझौता कर घरेलू हिंसा का शिकार होते रहते हैं। यही कारण है कि घरेलू हिंसा के शिकार होने वाले पुरुषों के लिये कुछ समाजसेवी संगठन बन रहे हैं। इन संगठनों के मुताबिक बेचारा आदमी अगर औरत पर हाथ उठाए तो जालिम, अगर औरत से पिट जाए तो बुजदिल, औरत को किसी के साथ देख लड़ाई करते ईष्र्यालु, चुप रहे तो बेगैरत घर के बाहर रहे तो आवारा, घर में रहे तो नकारा बच्चों को डांटे तो जालिम, न डांटे तो लापरवाह औरत को नौकरी से रोके तो शकी मिजाज न रोके तो बीवी की कमाई खाने वाला मां की माने तो मां का चमचा, बीवी की सुने तो जोरू का गुलाम। इसके बाद भी अपनी तकलीफ किसी से बता नहीं सकता। अ...

.. तो भारत बनेगा सबसे अच्छा

Image
आज भी सही मायने में गणतंत्र की सार्थकता से मीलों दूर हैं। तंत्र (सिस्टम) गण (जनता) के लिए स्थापित हुआ। पर, वह चंद हाथों की कठपुतली बन कर अंधेरे में गुम होती गई। अमीर तो पहले से ही फायदे में थे, लेकिन गरीब को कुछ न मिल सका। धनी और धनवान होते गए, गरीब और गरीब होते गए। यही वजह है कि आज भी काफी लोग एक जून की रोटी के लिए परेशान हैं। अशिक्षा, गरीबी, घर, कपड़े, रोजगार के लिए तरस रहे हैं। लोगों का ही विकास नहीं हुआ तो देश कहां से आगे बढ़ेगा। कुछ हद तक शिक्षित मध्यम वर्ग को कुछ लाभ मिला। यह दुर्भाग्यजनक है कि आज अंग्रेजी मीडियम से पढ़े-लिखे बच्चों को ही आगे बढ़ने का बेहतर मौका मिलता है, लेकिन जो अशिक्षित हैं उनके लिए क्या हो रहा है? सरकारी फाइलों में बहुत कुछ होता है, लेकिन तंत्र रूपी महाजाल से निकलते-निकलते रास्ते में ही दम तोड़ देता है। मैं अब 80 की उम्र पार कर चुकी हूं। सोचती हूं कि वर्तमान सरकार जो सोशलिस्ट मानी जा रही है, भोजन की कमी, भूमिहीनता, गरीबी जैसी समस्याओं के निदान में सफल नहीं हो सकी है। वन, नदी, झरना जैसे प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए बुनियादी सभ्य रवैया नहीं अपनाया जा रहा।...

इनका दर्द देख बीमारी को होता है अपराधबोध!

Image
 -गरीब के लिए महंगा व मिलावटी है चिकित्सा -सत्ता के कुछ ही दिनों मुख्यमंत्री ने देखा बदहाली का मंजर  राहुल मिश्रा, कोलकाता  गत कुछ दिनों में बंगाल ने देशभर में खूब सुर्खियां बटोरी। राजनीति, दोषारोपण और बहस का बाजार भी गर्म रहा। इसका पूरा श्रेय राज्य की बेहद बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को जाता है, जिसका शिकार सिर्फ आम गरीब जनता ही होती है। चिकित्सा के नाम पर जगह-जगह पंूजीपतियों की दुकान लग जाने, बदहाल सरकारी अस्पताल व भ्रष्ट तंत्र के कारण गरीबों के लिए इलाज नकली, मिलावटी और महंगा हो गया है। इन सबके बीच बीमार मजबूर गरीब संघर्ष करते-करते दम तोड़ देता है, जिसे देख भले ही हुक्मरानों को कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन अगर बीमारी को एहसास होता तो शायद उसे खुद में अपराधबोध होता। हुगली के किसान राजू नस्कर को टीबी से ग्रसित पिता बादल नस्कर की जान नहीं बचा पाने का काफी अफसोस है। गत दिनों महानगर के एक सरकारी अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ दिया। अपनी लाचारी को बयां करते हुए राजू कहते हैैं कि गांव के डाक्टर साहब ने पिताजी को पाइवेट नर्सिंग होम ले जाने की सलाह दी थी, लेकिन रुपये न होन...

क्लास, जहां 'क्लास' नहीं

Image
-एक ही बेंच पर बैठते हैैं महल व फुटपाथ दोनों के बच्चे  -कोई देता पूरी फीस, कोई आधा तो कइयों के माफ - सब को शिक्षा मुहैया कराना है मकसद राहुल मिश्रा, कोलकाता  शिक्षा के अधिकार कानून के तहत कहा गया है, सभी निजी स्कूलों में नर्सरी स्तर पर 25 फीसदी सीट आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए। इस कानून का जहां निजी स्कूलों के प्रिंसिपलों ने विरोध किया, वहीं कोलकाता के सियालदह स्थित लोरेटो स्कूल पूरे देश को अपनी नीतियों से सबक सिखा रही हैै।  इस स्कूल के आधे छात्र जहां डाक्टर, इंजीनियर, बिजनेसमैन जैसे उच्च वर्ग के बच्चे हैैं, वहीं आधे रिक्शा चालकों, फुटपाथी हाकर, घरों में मजदूरी करने वाले, भीख मांगने वाले जैसे अति निम्न वर्ग के परिवारों के बच्चे हैैं, तो कुछ अनाथ व फुटपाथ से उठाए गए हैैं। दोनों ही श्रेणी के बच्चे एक साथ कक्षा में एक ही बेंच पर बैठकर समान शिक्षा ग्रहण करते हैैं, साथ में खेलने, पढऩे के साथ खाना भी खाते हैैं।  इस स्कूल में करीब 1400 छात्र हैैं, जिनमें से सिर्फ 450 छात्र हैं, जो पूरा फीस देते हैैं, जबकि आधा से अधिक ऐसे छात्र है ज...

आधी रात के बाद सजती है रजिया की दुकान

Image
राहुल मिश्रा, कोलकाता  कहते हैैं मां का दिल सबसे कोमल होता है और अपने बच्चे की हिफाजत के लिए वह पूरी दुनिया से लड़ सकती है। यह बात आधी रात को महानगर की सुनसान सड़क पर अपने बेटे को दुलारती, पुचकारती एक मां को देखने और उसकी कहानी सुनने के बाद नकारा नहीं जा सकता। रजिया सुल्तानी एक 26 वर्षीया मां हैै। उसमें अपने बेटे जावेद के लिए जितना 'मांÓ का प्यार है, उतना ही एक 'बेबस युवतीÓ की नफरत समाज और दुनिया के लोगों से हैै, जिनसे उसे जिन्दगी भर ठोकरे ही मिली। उन ठोकरों ने रजिया के सीने को इतना मजबूत बना दिया कि आज उसके सामने दर्द कोई मायने नहीं रखता। रजिया की यही हिम्मत उसे चांदनी चौक इलाके की सुनसान सड़क पर अपने बेटे जावेद के साथ पूरी रात बिताने में मदद करती है।  जब महानगर के हर घर की बत्तियां बुझ जाती हैं और लोग बिस्तर पर अपने बच्चों के साथ सोने की तैयारी में जुट जाते हैैं, तब रजिया अपने जिगर के टुकड़े के साथ अपनी दुकान सजाती है। जब कीचन रूम का दरवाजा बंद होता है, तो रजिया चूल्हे में आग फूंकती है।  रजिया बताती है, एक साल पहले अपने बेटे के साथ कोलकाता आयी। यहां आने के...