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तसलीमा की 'चार कन्या' से 'दूसरा पक्ष' को जाना

राहुल मिश्रा गत दिनों तसलीमा पर बहस के बाद उसे जानने का शौक चढ़ा. पुस्तक मेले से उसकी पुस्तक 'चार कन्या' का हिन्दी अनुवाद खरीदा था. पुस्तक का पहला भाग 'दूसरा पक्ष' पढ़ा. दो बहनों का पत्रों के जरिये संवाद शैली में लिखी गयी यह कहानी से तसलीमा की कला और कलम दोनों से वाकिफ हुआ. घर परिवार छोड़ ढाका शहर में रहनेवाली आजाद, शिक्षित, स्वाबलंबी और धर्म में विश्वास नहीं रखने वाली मुस्लिम लड़की यमुना और मैमनसिंह में रहने माता-पिता, भैया-भाभी के साथ रह रही जवान लड़की उसकी छोटी बहन नुपूर दीदी को बुबू बुलाती है. दोनों की संवाद कहानी के जरिये बांग्लादेश के मुस्लिम घरों में लड़कियों की स्थिति का पता चलता है. यहां समय के साथ परदों और बंदिशों में जकड़ती जाती मुस्लिम समाज की महिलाओं की व्यथा मैंने जाना. मुझे कष्ट तो हुआ ही, साथ ही पुरुष होने और पुरुषों के बनाये समाज में महिलाओं की घुट-घुट मरने की प्रथा पर शर्म भी आयी. यमुना उन बेड़ियों को तोड़ कर अपने मुताबिक जी रही है, लेकिन समाज के लोगों की नजरें जैसे उसे डसने को आतुर हो. उसका अतीत उसे तोड़ने की कोशिश करता है. फिर भी हिम्मत नहीं हारती और...

पीएम अंकल, दे दो ना मेरा पापा

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-आठ साल बाद भी लापता फ्लाईट इंजीनियर का सुराग नहीं - पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन से 16 नवंबर 2004 से है लापता                            प्रधानमंत्री के नाम एक मासूम का पत्र   -आद्या झा (निक्की) पीएम अंकल, मेरा पापा दे दो ना, प्लीज. मुङो पता है, मेरे पापा संजय कुमार झा आप लोगों के पास ही हैं. उन्हें आप लोगों ने कहीं छिपा दिया है. आप लोग झूठ कहते हैं, वह खो गये हैं. वह कोई बच्च हैं या गुड़िया जो खो जायेंगे. आठ साल हो गये. अब और मजाक मत कीजिये. देखो ना, मैं भी अब आठ साल की हो गयी. लेकिन पापा को सिर्फ फोटो में ही देखा है. मम्मी-दादी से जब भी पूछती हूं, पापा कब आयेंगे, तो हमेशा कहती हैं, बाबू, जल्दी आ जायेंगे. और न जाने क्यों रोने लगती हैं. सभी लोग कहते हैं कि पापा जहां पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन में डय़ूटी कर रहे थे, वहां से खो गये. हमें इतना बेवकूफ समझते हैं क्या ? मम्मी पूरी-पूरी रात सोती नहीं. पापा के लिए रोती हैं. नानी कह रही थी, पापा-मम्मी की शादी के कुछ...

मोहल्ले के आतंकियों के लिए है कोई कानून

राहुल मिश्र, कोलकाता मोहल्ले के मास्टर महाशय टय़ूशन पढ़ा कर लौट रहे थे. रात हो गयी थी. रास्ते में अचानक खेत से चीख सुनाई दी. पास गये तो देखा : तीन युवक एक के पेट में चाकू घोंपे जा रहे थे. सामने हत्या होते बुजुर्ग मास्टर भय से पसीना-पसीना हो गये. हत्यारों ने उन्हें देख लिया. वे पास आये और कहा : सर, आपने कुछ नहीं देखा. चुपचाप घर जायिये. अपने ही पढ़ाये छात्रों के हाथों कत्ल देखने के बाद बेचैनी में मास्टर की रात नींद हराम हो गयी. बच्चों के लाख पूछने पर भी कुछ न बताते. बार-बार चौंक उठते. सुबह हुई तो दरवाजे पर हत्यारे खड़े मिले. घर से निकलते, टय़ूशन-बाजार जाते हर वक्त हत्यारों की निगाहें डराती नजर आती. कभी ये खिड़की पर आ धमकते, तो कभी साइकिल से पीछा करके याद दिलाता कि आपने कुछ नहीं देखा. इसी तरह दहशत में दिन बीतते गये. एक बार दायित्व समझते हुए हिम्मत जुटा कर थाने पहुंचे, तो थाने के अफसर ने राजनीतिक हत्या के मामलों में न पड़ने की सलाह देते हुए घर भेज दिया. खबर हत्यारों तक पहुंच गयी. अंजाम के तौर पर बेटे को दरवाजे पर खून में लथपथ पाया और अगले दिन बेटी के चेहरे पर एसिड उड़ेल दिया गया. यह कहानी सि...

इनकी दुनिया : है आस-पास, पर पूरी अलग

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क, ख, ग. जैसे शब्दों से आज तक नहीं हुआ सामना बचपन की दहलीज पर पहुंचते ही पेट चलाने के लिए विवश विकास गुप्ता कोलकाता बिडन स्ट्रीट का बेथुन कॉलेजिएट स्कूल. मौका माध्यमिक परीक्षा के रिजल्ट की घोषणा का. स्कूल परिसर में छात्राओं का जमघट. अचानक रिजल्ट की घोषणा हुई. नंबर जानने की उत्सुकता में सारे नोटिस बोर्ड के पास एकत्रित हुए. धीरे-धीरे माहौल उत्साह से भर गया. पास होने वाली छात्राएं खुशी से झूम उठी. इसी बीच अचानक स्कूल के गेट पर नजर गयी. छात्राओं की हरकतों को हैरतअंगेज निगाहों से कुछ मासूम बो लगातार देख रहे थे. उम्र में वे करीब छह-सात वर्ष के होंगे. वे स्कूल में रोज से अलग इस जश्न भरे माहौल को हैरान होकर देख रहे थे. इसी बीच स्कूल के दरवान की डांट खाकर इधर-उधर भाग जाते. दो मिनट के बाद गेट पर फिर से आकर खडे. हो जाते. सवालों से भरी मासूमों की निगाहें मानो पूछ रही हो : क्या हो रहा है अंदर? किसी पार्टी की तैयारी तो नहीं हो रही ? सभी छात्राएं किस बात पर इतना उत्साहित है ? उनके सवालों का जवाब देने वाला कोई नहीं. इसी बीच एक बो ने स्कूल से बाहर निकल रही महिला से डरते हुए पूछ दिया : अंट...

बीवी की नहीं, अपने सोच की मरम्मत करें

राहुल मिश्र, कोलकाता बीवी की मरम्मत करना कुछ मर्दो के लिए गर्व की बात होती है. तभी तो इसका एलान वे अपने दोस्तों में सीना ठोक कर करते हैं, मानो शादी के समय उन्हें समय-समय पर बीवी की मरम्मत करने की खास जिम्मेदारी दी गयी हो. मेरे एक परिचित सुबह-सुबह आये और कहने लगे, चली गयी वो, चारों बच्चों को लेकर मायके. मैंने भी कह दिया, जा रही हो तो हमेशा के लिए जाओ. लौट के मत आना. मैंने पूछा, अचानक ऐसा क्या हुआ, जो भाभी चली गयीं? उन्होंने कहा- मत पूछो, नाक में दम कर रखा था. जब से उसकी मां और भाइयों को घर आने से मना कर दिया, तब से दुश्मन जैसा बरताव कर रही थी. बच्चों को मेरे खिलाफ सिखाती-पढ़ाती है. कल मेरी बहन आयी थी, तो उसके साथ बदतमीजी करने लगी. बताओ, कोई मर्द यह बरदाश्त कर सकता है. इसी पर उसकी जम कर मरम्मत कर दी. तो रो-रो कर पूरा मोहल्ला जमा कर लिया. अपनी मां को फोन लगा दिया. उस बुढ़िया ने उसे चले आने को कहा. सारे फसाद की जड़ वही बुढ़िया है. कभी उसकी भी मरम्मत करूंगा, तब होश ठिकाने आयेगा. मैंने समझाया- देखिए, ऐसे मारपीट मत किया कीजिए. छोटे-छोटे बच्चे हैं, उनके दिमाग पर बुर...

तेरा परिवार-मेरा परिवार का झगड़ा

भारतीय सामाजिक व्यवस्था के अनुसार विवाह को एक बेहद धार्मिक संस्था का दर्जा दिया जाता है और साथ ही इस बंधन में बंधने वाले महिला-पुरुष को पारिवारिक और सामाजिक दोनों ही तौर पर ताउम्र साथ रहने की अनुमति प्रदान की जाती है और साथ ही वह तन-मन से एक-दूसरे के प्रति समर्पित हो जाते हैं. विवाहित संबंध की एक और सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह संबंध ना सिर्फ महिला-पुरुष को एक साथ जोड़कर रखता है बल्कि उन दोनों के परिवारों को भी एक ऐसे नाजुक बंधन में बांध देता है जो उन्हें हर हाल में निभाना पड़ता है. हालांकि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि परिवार वालों का संरक्षण दांपत्य जीवन को और अधिक मजबूत बनाने में सहायक होता है लेकिन आज जब बदलती जीवनशैली और प्राथमिकताओं के बीच दांपत्य जीवन में तनाव का आगमन होने लगा है तो हम इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते कि कहीं ना कहीं विवाहित दंपत्तियों के बीच इस बढ़ते फासले का कारण परिवारवाले भी हैं. विवाह के बाद महिला अपने परिवार को छोड़कर अपने पति के परिवारवालों को स्वीकार कर लेती है वहीं पुरुष की भी जिम्मेदारी अपने और पत्नी दोनों के ही परिवारवालों के लिए बन जाती है. दो लोगों...

पोर्न पर रोक

हाल ही में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट पर अश्लील साइटों की भारी बढ़ोत्तरी पर चिंता जाहिर करते हुए एक नोटिस जारी कर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया. एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए अल्तमस कबीर की अध्यक्षता  वाली पीठ ने माना कि इंटरनेट के लिये कोई विशेष कानून नहीं होने के कारण इस पर मनमाने ढंग से कई ऐसी चीजें डाल दी जाती हैं जो समाज के लिये सही नहीं हैं, खासकर अश्लील साइटें यहां बेधड़क बनाई और देखी जाती हैं. इंटरनेट की बढ़ती उपयोगिता से बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं और ऐसी साइटें उन्हें समय से पहले परिपक्व व हिंसक बना रही हैं. अतः सूचना और प्रौद्योगिकी, सूचना एवं प्रसारण, गृह मंत्रालय तथा संबंधित अन्य संबंधित सरकारी कार्यालयों को निर्देश देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से इस पर जरूरी दिशानिर्देश जारी करने को कहा है. भारत में इंटरनेट के उपयोग की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश महत्वपूर्ण माना जा रहा है और उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही इस पर कोई कानून बनेगा. इंटरनेट के खुले उपयोग पर पाबंदियों का मामला कोई नया नहीं है. कई देशों ने इस पर चिंता जताई है और इस दिशा मे कदम भी...