एे खूबसूरत जिंदगी (कविता)

एे खूबसूरत जिंदगी
कब तक तू किसी और आस पर कटती रहोगी,
क्या तुझमें जीने की कोई ख्वाइश नहीं ?
तेरे सिप पर पैर रख कर कोई करता है मौज जिंदगी,
फिर भी तुझे शर्म न आती हाये जिंदगी।
तू जननी है, तू करनी है और तू ही भरनी है,
फिर भी तेरी दुर्दशा कैसे सहनीय है।
तो जाग और तोड़ दे, कब्र की इन दीवारों को,
और कर दे हाहाकार एे खूबसूरत जिंदगी ।

-राहुल मिश्रा
(महिलाओं की जिंदगी को समर्पित)

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