Ramesh Dvedi हम प्रवासियों पर फ़ाकिर का अंदाज-ए-बयां, बस क्या कहने ! कौन कहता है कि ग़ज़लें तो बस मेहदी हसन, गुलाम अली व जगजीत-चित्र सिंह की ही सुनने में अच्छी लगती हैं. ग़ज़ल, नज़्म-ओ-मौसीक़ी की वो उम्दा विधा है, जो पहले उसे अपनी आवाज़ देनेवाले को ज़िंदाबाद करती है. फिर अक्सरहां सामईन (श्रोताओं) के दिलोदिमाग को इस कदर ङिांझोड़ती है कि वह मुकम्मल ग़ज़ल की हर कड़ी को तलाशने लगता है. ग़ज़ल के समंदर में जब गोता लगाया, तो ये जाना-समझा कि असल में ग़ज़ल गाकर कोई मशहूर नहीं होता, बल्कि ग़ज़ल उसे गानेवाले को मशहूर कर देती है. ये हक़ीकत तभी से पुख्ता है, जब शायर सुदर्शन फ़ाकिर की इस ग़ज़ल को राजेंद्र मेहता व नीना मेहता की युगल आवाज़ में सुना. और गांव-जवार की सौंधी माटी से मजबूरन दूर होने की कसक से तड़प उठा. एक प्यारा-सा गांव, जिसमें पीपल की छांव छांव में आशियां था, एक छोटा मकां था छोड़ कर गांव को, उस घनी छांव को शहर के हो गये हैं, भीड़ में खो गये हैं वो नदी का किनारा, जिसपे बचपन गुज़ारा वो लड़कपन दिवाना, रोज़ पनघट पे जाना फिर जब आयी जवानी, बन गये हम कहानी छोड़ कर गांव को, उस उस घनी छांव को श...