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एे खूबसूरत जिंदगी (कविता)

एे खूबसूरत जिंदगी कब तक तू किसी और आस पर कटती रहोगी, क्या तुझमें जीने की कोई ख्वाइश नहीं ? तेरे सिप पर पैर रख कर कोई करता है मौज जिंदगी, फिर भी तुझे शर्म न आती हाये जिंदगी। तू जननी है, तू करनी है और तू ही भरनी है, फिर भी तेरी दुर्दशा कैसे सहनीय है। तो जाग और तोड़ दे, कब्र की इन दीवारों को, और कर दे हाहाकार एे खूबसूरत जिंदगी । -राहुल मिश्रा (महिलाओं की जिंदगी को समर्पित)

रोटी के लिए झाड़ू-पोंछा लगाने वाली बेबी बनी मशहूर लेखिका

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IANS | दो वक्त की रोटी की खातिर दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा लगाने वाली बेबी हालदार किस तरह लेखिका बन गई, यह तो आपने सुना ही होगा। बेबी की दास्तान से पता चलता है कि इंसान के भीतर का दर्द किस तरह पूरी दुनिया के दर्द को वाणी देने की ताकत रखता है। बेबी हालदार की पहली किताब आलो आंधारि कुछ बरस पहले हिंदी में प्रकाशित हुई थी और अब तक उसके कई संस्करण छप चुके हैं। इसका बांग्ला संस्करण भी प्रकाशित हुआ है जिसका विमोचन सुपरिचित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने किया। यह उपन्यास छपने के बाद बेबी के अड़ोस-पड़ोस में काम करने वाली दूसरी नौकरानियों को भी लगने लगा है कि यह तो उनकी ही कहानी है। कमाल यह है कि बेबी हालदार आज भी खुद को काजेर मेये (काम करने वाली बाई) कहती हैं। 29 साल पहले जम्मू एवं कश्मीर के किसी ऐसी जगह में उनका जन्म हुआ, जहां उनके पिता सेना में थे। अभाव और दुख की पीड़ा झेलती बेबी अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि अपनी किताब आलो आंधारि को मानती हैं। बेबी हालदार की आत्मकथा आप भी सुनिए, कुछ उन्हीं की जुबानी : पिता सेना में थे,लेकिन घर से उनका सरोकार कम ही ...

आस्था और अंधविश्वास में अंतर को जानें

आस्था सबल बनाती, तो अंधविश्वास कमजोर आस्था एक इन्सान को सबल बनाती है तो अंधविश्वास कमजोर करता है | आस्था एक साधारण इन्सान को आत्मविश्वास प्रदान करती है | अपने परिवार, समाज व् देश पर आस्था होना आवश्यक है | इसी प्रकार एक साधारण इन्सान को अपना आत्मबल बनाये रखने के लिए ईश्वर,भगवान, अल्लाह व् वाहे गुरु आदि में आस्था रखनी पड़ती है | ऐसे ही इंसानों को हम आस्तिक कहते है और जो इनमे वे जो विश्वास नहीं रखता उसे नास्तिक कहा जाता है | नास्तिक होना एक साधारण इन्सान के वश से बाहर है , क्योंकि इसके लिए बहुत बड़ा जिगर चाहिए या बहुत ही निर्भीक होने की आवश्यकता है | भगत सिहं नास्तिक थे  शहीद-ए-आज़म भगत सिंह नास्तिक थे | उन्होंने इस सच्चाई को सहृदय स्वीकार किया तथा अपने को नास्तिक होने के कारणों को बहुत ही स्पष्ट तरीके से अपने लेख - ''मै नास्तिक क्यों?'' में वर्णन किया है | हर कोई भगत सिंह तो बनना चाहता है , लेकिन हमारे जैसे साधारण लोगों के लिए उनके आदर्शों तथा नीति पर चलना संभव नहीं | आम जीवन में देखा गया है कि आस्तिक व् नास्तिक इंसानों के कार्य समान रूप से होते रहते हैं, इस...

शक्ति पूजा में भक्तों ने काटी जीभ, देवी को चढ़ाया रक्त

आस्था का अंधा ज्वार  आस्था के उन्माद में व्यक्ति क्या कुछ नहीं कर गुजरता। इस बार आस्था और अंधविश्वास की अपनी विशेष प्रस्तुति में हम आपको बता रहे हैं शक्ति पूजा के बारे में । खासकर नवरात्र के मौके पर श्रद्धालुओं का उन्माद। इस ज्वार में भक्त कभी स्वयं के शरीर को तकलीफ पहुँचाकर देवी को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं तो कभी ‘देवी आना’ यह मानकर अजीब हरकतें करते हैं।  यूँ तो शक्ति पूजा में उन्माद का नजारा बेहद आम होता है, लेकिन नवरात्र के समय उन्माद का यह ज्वार अपनी हर सीमा पार कर जाता है। गली-गली में बने दुर्गा मंदिर के बाहर लोग पागलों की तरह झूमते-नाचते नजर आते हैं। इन लोगों का न तो अपने शरीर पर काबू रहता है न ही दिमाग पर। सबसे पहले हम रुख करते हैं इंदौर के एक दुर्गा मंदिर का। कहा जाता है कि यहाँ के पुजारी को दुर्गाजी की सवारी आती है। वहाँ कई लोग अजीब तरह से झूमते रहते हैं। वहाँ के मुख्य पुजारी जलता कपूर अपने मुख में रखकर तलवार हाथ में लिए भक्तों के बीच कूदते रहते हैं। यहाँ आए श्रद्धालु उन्हें देवीस्वरूप मान उनकी पूजा करते हैं। साथ ही साथ कई अन्य भक्त भी पागलों की तर...

जहाँ गाय के खुरों तले कुचले जाते हैं लोग

झाबुआ के आदिवासी अंचल का गाय गौरी उत्सव  भारत रस्मो-रिवाज और अनूठी प्रथाओं का देश है। यहाँ भाँति-भाँति की परंपराएँ हैं, जिनकी शुरुआत तो आस्था से होती है, लेकिन अंतत: वे अंधविश्वास में परिण‍ित हो जाती हैं। आस्था और अंधविश्वास की अपनी इस कड़ी में मैं आपको रूबरू करा रहा हूं मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचल झाबुआ की अनूठी प्रथा गाय गौरी से। यह उत्सव दीवाली के अगले दिन गोवर्धन (पड़वा) के दिन मनाया जाता है। इस दिन सुबह से ही आदिवासी अपने गाय-बैलों को नहला-धुलाकर उन पर रंगीन छापे लगाकर, उनके सींगों पर कलगी बाँधते हैं। फिर गाँव में स्थित गोवर्धन मंदिर में पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा के बाद गाँववासी मंदिर की पाँच परिक्रमा लगाते हैं। परिक्रमा के दौरान गाँवभर की गायें परिक्रमा की अगवानी करती हैं। गाँव की महिलाएँ और बुजुर्ग ढोल-मंजीरे की थाप पर अष्ट छाप कवियों के पद गाते हुए परिक्रमा करती हैं। ये नजारा बेहद सुंदर लगता है, लेकिन तभी शुरू हो जाता है गाय गौरी का वह रूप जिसे देखकर अच्छे से अच्छा व्यक्ति काँप जाता है। जी हाँ, गोमाता को मनाने के लिए आदिवासी अपनी गाय और सैकड़ों अन्य गायों के...

नरबलि का एक और रूप...

काली माँ को संतुष्ट करती ‘अड़वी’ प्रथा...  क्या आपने इस आधुनिक युग में नर बलि के बारे में सोचा है? नहीं सोचा तो जरा द्रविड़ियन संस्कृति की पूजा-पद्धति पर गौर कीजिए, जहाँ भक्त अपने इष्ट देव को प्रसन्न करने के लिए नर बलि तक का सहारा लेता है। मगर अधिकतर हम ऐसी बातों को सुनकर या पढ़कर चकित ही होते हैं। आस्था और अंधविश्वास की इस कड़ी में हम आपको एक ऐसी ही अजीबोगरीब परंपरा के विषय में बता रहे हैं, जिसमें नर कटीली झाड़ियों को लपेटकर जमीन पर लोटता है और काली माँ को खून चढ़ाते हैं। अड़वी नामक यह प्रथा केरल के ‘कुरमपला देवी मंदिर’ में संपन्न की जाती है। यह मंदिर तिरुवनंतपुरम से करीब सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। काली माँ की आराधना के लिए की जाने वाली यह प्रथा हर पाँच साल में करीब एक बार आयोजित की जाती है। मान्यता के अनुसार अड़वी वेलन नामक एक पुजारी की पूज्यनीय देवी थीं। एक बार वेलन पूजा-अर्चना करके मंदिर के पास से गुजर रहे थे। मंदिर के पास देवी माँ ने वेलन के पास निहित अड़वी देवी को अपनी शक्तियाँ प्रदान कीं। तत्पश्चात देवा माँ की शक्तियों की आराधना हेतु भक्त नरबलि देने लग...

फ़ाकिर साहब को हज़ारों बार सलाम-नमस्ते!

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Ramesh Dvedi हम प्रवासियों पर फ़ाकिर का अंदाज-ए-बयां, बस क्या कहने ! कौन कहता है कि ग़ज़लें तो बस मेहदी हसन, गुलाम अली व जगजीत-चित्र सिंह की ही सुनने में अच्छी लगती हैं. ग़ज़ल, नज़्म-ओ-मौसीक़ी की वो उम्दा विधा है, जो पहले उसे अपनी आवाज़ देनेवाले को ज़िंदाबाद करती है. फिर अक्सरहां सामईन (श्रोताओं) के दिलोदिमाग को इस कदर ङिांझोड़ती है कि वह मुकम्मल ग़ज़ल की हर कड़ी को तलाशने लगता है. ग़ज़ल के समंदर में जब गोता लगाया, तो ये जाना-समझा कि असल में ग़ज़ल गाकर कोई मशहूर नहीं होता, बल्कि ग़ज़ल उसे गानेवाले को मशहूर कर देती है. ये हक़ीकत तभी से पुख्ता है, जब शायर सुदर्शन फ़ाकिर की इस ग़ज़ल को राजेंद्र मेहता व नीना मेहता की युगल आवाज़ में सुना. और गांव-जवार की सौंधी माटी से मजबूरन दूर होने की कसक से तड़प उठा. एक प्यारा-सा गांव, जिसमें पीपल की छांव छांव में आशियां था, एक छोटा मकां था छोड़ कर गांव को, उस घनी छांव को शहर के हो गये हैं, भीड़ में खो गये हैं वो नदी का किनारा, जिसपे बचपन गुज़ारा वो लड़कपन दिवाना, रोज़ पनघट पे जाना फिर जब आयी जवानी, बन गये हम कहानी छोड़ कर गांव को, उस उस घनी छांव को श...